धूल Poetry (page 4)

मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ रौशन हुआ

ज़की तारिक़

हरे मौसम खिलेंगे सोना बन के ख़ाक बदलेगी

ज़काउद्दीन शायाँ

उतरें गहराई में तब ख़ाक से पानी आए

ज़करिय़ा शाज़

पानी निकल के दश्त में जारी है जा-ब-जा

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

वहशत में याद आए है ज़ंजीर देख कर

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

क़ाइल भला हों नामा-बरी में सबा के ख़ाक

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

इश्क़ की मंज़िल में अब तक रस्म मर जाने की है

ज़ेब बरैलवी

दिल-ए-फ़सुर्दा को अब ताक़त-ए-क़रार नहीं

ज़ाहिदा ज़ैदी

मैं किनारों को रुलाने लगा हूँ

ज़ाहिद शम्सी

मिरे लोगो! मैं ख़ाली हाथ आया हूँ

ज़ाहिद मसूद

'अनीस-नागी' के नाम

ज़ाहिद मसूद

जहान-ए-तंग में तन्हा हुआ मैं

ज़ाहिद फ़ारानी

मकीन ही अजीब हैं

ज़हीर सिद्दीक़ी

यूँ ही हम दर्द अपना खो रहे हैं

ज़हीर रहमती

कितना दिलकश है तिरी याद का पाला हुआ अश्क

ज़हीर काश्मीरी

बर्क़-ए-ज़माना दूर थी लेकिन मिशअल-ए-ख़ाना दूर न थी

ज़हीर काश्मीरी

मौसम बदला रुत गदराई अहल-ए-जुनूँ बेबाक हुए

ज़हीर काश्मीरी

मरना अज़ाब था कभी जीना अज़ाब था

ज़हीर काश्मीरी

मरना अज़ाब था कभी जीना अज़ाब था

ज़हीर काश्मीरी

फ़र्ज़ बरसों की इबादत का अदा हो जैसे

ज़हीर काश्मीरी

इक शख़्स रात बंद-ए-क़बा खोलता रहा

ज़हीर काश्मीरी

इक शख़्स रात बंद-ए-क़बा खोलता रहा

ज़हीर काश्मीरी

अब दर्द बे-दयार है और जग-हँसाई है

ज़हीर फ़तेहपूरी

मुरादें कोई पाता है किसी की जान जाती है

ज़हीर देहलवी

ज़हर-ए-साअत ही पिएँ जिस्म तह-ए-ख़ाक तो हो

ज़फ़र सिद्दीक़ी

जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी

ज़फ़र सहबाई

जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी

ज़फ़र सहबाई

अमीर-ए-शहर इस इक बात से ख़फ़ा है बहुत

ज़फ़र सहबाई

जिस रोज़ से अपना मुझे इदराक हुआ है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

बुझा नहीं मिरे अंदर का आफ़्ताब अभी

ज़फ़र इक़बाल

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