सपना Poetry (page 8)

नज़्म

ज़ाहिद डार

कुछ यक़ीं रहने दिया कुछ वाहिमा रहने दिया

ज़ाहिद अाफ़ाक

हाँ वो मैं ही था कि जिस ने ख़्वाब ढोया सुब्ह तक

ज़हीर सिद्दीक़ी

यूँ ही हम दर्द अपना खो रहे हैं

ज़हीर रहमती

ख़ुशी से अपना घर आबाद कर के

ज़हीर रहमती

इशारे मुद्दतों से कर रहा है

ज़हीर रहमती

इक शख़्स रात बंद-ए-क़बा खोलता रहा

ज़हीर काश्मीरी

इक शख़्स रात बंद-ए-क़बा खोलता रहा

ज़हीर काश्मीरी

हर आदमी को ख़्वाब दिखाना मुहाल है

ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

चौंक पड़ता हूँ ख़ुशी से जो वो आ जाते हैं

ज़हीर देहलवी

वाँ तबीअत दम-ए-तक़रीर बिगड़ जाती है

ज़हीर देहलवी

दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा

ज़हीर देहलवी

बिगड़ कर अदू से दिखाते हैं आप

ज़हीर देहलवी

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

खिड़की से महताब न देखो

ज़फ़र कलीम

वो नहीं उस की मगर जादूगरी मौजूद है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

एक इक पल तिरा नायाब भी हो सकता है

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

दिल-ओ-निगाह को वीरान कर दिया मैं ने

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

चमका जो तीरगी में उजाला बिखर गया

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

आइना देखें न हम अक्स ही अपना देखें

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

लगता है इतना वक़्त मिरे डूबने में क्यूँ

ज़फ़र इक़बाल

इतना मानूस भी होने की ज़रूरत क्या थी

ज़फ़र इक़बाल

हमारा इश्क़ रवाँ है रुकावटों में 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

भरी रहे अभी आँखों में उस के नाम की नींद

ज़फ़र इक़बाल

ये नहीं कहता कि दोबारा वही आवाज़ दे

ज़फ़र इक़बाल

ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो

ज़फ़र इक़बाल

ये बात अलग है मिरा क़ातिल भी वही था

ज़फ़र इक़बाल

वो एक तरहा से इक़रार करने आया था

ज़फ़र इक़बाल

वही मिरे ख़स-ओ-ख़ाशाक से निकलता है

ज़फ़र इक़बाल

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