भगवान Poetry (page 64)

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

अनवर साबरी

यहाँ काँप जाते हैं फ़लसफ़े ये बड़ा अजीब मक़ाम है

अनवर मिर्ज़ापुरी

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दा पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

रुख़ से पर्दा उठा दे ज़रा साक़िया बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जाएगा

अनवर मिर्ज़ापुरी

तय हो गया है मसअला जब इंतिसाब का

अनवर मसूद

दरमियाँ गर न तिरा वादा-ए-फ़र्दा होता

अनवर मसूद

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ

अनवर जलालपुरी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

ये दिल ही जानता है फिर कहाँ कहाँ भटके

अनुभव गुप्ता

क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी

अंजुम सिद्दीक़ी

उस ख़ुदा की तलाश है 'अंजुम'

अंजुम सलीमी

रौशनी भी नहीं हवा भी नहीं

अंजुम सलीमी

जब ख़ुदा भी नहीं था साथ मरे

अंजुम सलीमी

टूटे हुए प्याले

अंजुम सलीमी

तन्हाई का सफ़रनामा

अंजुम सलीमी

सारा शगुफ़्ता

अंजुम सलीमी

इंहिराफ़

अंजुम सलीमी

एक और मुुहब्बत....

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

कैसी सोहबत है कैसी तन्हाई

अंजुम सलीमी

फ़लक-नज़ाद सही सर-निगूँ ज़मीं पे था मैं

अंजुम सलीमी

चराग़ हाथ में हो तो हवा मुसीबत है

अंजुम सलीमी

जाए ख़िरद नहीं है कि फ़रज़ाना चाहिए

अंजुम रूमानी

हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए

अंजुम रूमानी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

शब-ए-फ़िराक़ अचानक ख़याल आया मुझे

अंजुम ख़याली

घर में मिट्टी का दिया मौजूद है

अंजुम ख़याली

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

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