लोग Poetry (page 12)

मैं ने ही न कुछ खोया जो पाया न किसी को

शोहरत बुख़ारी

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं

शोहरत बुख़ारी

सारा जहान छोड़ के तुम से ही प्यार था

शोभा कुक्कल

ख़्वाब थे मेरे कुछ सुहाने से

शोभा कुक्कल

मिरी तलाश में उस पार लोग जाते हैं

शोएब निज़ाम

किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं

शोएब निज़ाम

दरों को चुनता हूँ दीवार से निकलता हूँ

शोएब निज़ाम

क़ल्ब का एहतिजाज होता है

शमशाद शाद

चाहे दीवाना कहें या लोग सौदाई कहें

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

मुस्लिम-लीग

शिबली नोमानी

हमारे दर्द की जानिब इशारा करती हैं

शहपर रसूल

आम सा दूल्हा

शीरीं अहमद

कोई दुआ कभी तो हमारी क़ुबूल कर

शीन काफ़ निज़ाम

जिन से अँधेरी रातों में जल जाते थे दिए

शीन काफ़ निज़ाम

अपनी पहचान भीड़ में खो कर

शीन काफ़ निज़ाम

वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए

शीन काफ़ निज़ाम

आँखों में रात ख़्वाब का ख़ंजर उतर गया

शीन काफ़ निज़ाम

आज हर सम्त भागते हैं लोग

शीन काफ़ निज़ाम

दीप जले तो दीप बुझाने आते हैं

शाज़िया अकबर

उन से मिलते थे तो सब कहते थे क्यूँ मिलते हो

शाज़ तमकनत

हम-ज़ाद

शाज़ तमकनत

दर-गुज़र

शाज़ तमकनत

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

ख़्वाब नादिम हैं कि ता'बीर दिखाने से गए

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

शिकोह-ए-ज़ात से दुश्मन का लश्कर काँप जाता है

शायान क़ुरैशी

शब-हाए-ऐश का वो ज़माना किधर गया

शौक़ देहलवी मक्की

ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से ये नुमायाँ है ग़ालिबन

शौक़ बहराइची

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