लोग Poetry (page 14)

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

शमीम करहानी

चाहा बयाँ करूँ जों है मेरे ख़याल में

शमीम हाश्मी

फिर लौट के इस बज़्म में आने के नहीं हैं

शमीम हनफ़ी

लक़ड़हारे तुम्हारे खेल अब अच्छे नहीं लगते

शमीम हनफ़ी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

ऐसे कई सवाल हैं जिन का जवाब कुछ नहीं

शमीम हनफ़ी

ज़िंदगी हँसती है सुब्ह-ओ-शाम तेरे शहर में

शमीम फ़तेहपुरी

संग मजनूँ पे लड़कपन में उठाया क्यूँ था

शकील शम्सी

गर्दिश में ज़हर भी है मुसलसल लहू के साथ

शकील जाज़िब

कुछ लोग हैं जो झेल रहे हैं मुसीबतें

शकील जमाली

वो लोग आएँ जिन्हें हौसला ज़ियादा है

शकील जमाली

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है

शकील जमाली

दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है

शकील जमाली

अल्फ़ाज़ नर्म हो गए लहजे बदल गए

शकील जमाली

ये सिलसिला ग़मों का न जाने कहाँ से है

शकील ग्वालिआरी

चाक कर कर के गरेबाँ रोज़ सीना चाहिए

शकील ग्वालिआरी

ये ऐश-ओ-तरब के मतवाले बे-कार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

करने दो अगर क़त्ताल-ए-जहाँ तलवार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

ज़मीन ले के वो आए तो घर बनाया जाए

शकील आज़मी

ज़रा से ग़म के लिए जान से गुज़र जाना

शकील आज़मी

राह में घर के इशारे भी नहीं निकलेंगे

शकील आज़मी

हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए

शकील आज़मी

अब इस से मिलने की उम्मीद क्या गुमाँ भी नहीं

शकील आज़मी

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख

शकेब जलाली

जिस दम क़फ़स में मौसम-ए-गुल की ख़बर गई

शकेब जलाली

इश्क़ के ग़म-गुसार हैं हम लोग

शकेब जलाली

बेजा नवाज़िशात का बार-ए-गराँ नहीं

शकेब जलाली

जुनून-ए-इश्क़ की आमादगी ने कुछ न दिया

शाइस्ता सहर

न दिन ही चैन से गुज़रा न कोई रात मिरी

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

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