लोग Poetry (page 45)
आज मक़्तल में ख़बर है कि चराग़ाँ होगा
बेताब सूरी
न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे
बेताब लखनवी
न देखे होंगे रिंद-ए-ला-उबाली तुम ने 'बेख़ुद' से
बेख़ुद देहलवी
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे
बेख़ुद देहलवी
वो मेरे क़त्ल का मुल्ज़िम है लोग कहते हैं
बेकल उत्साही
उलझ रहे हैं बहुत लोग मेरी शोहरत से
बेकल उत्साही
तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे
बेकल उत्साही
तंज़ की तेग़ मुझी पर सभी खींचे होंगे
बेकल उत्साही
ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था
बेकल उत्साही
ख़ोल चेहरों पे चढ़ाने नहीं आते हम को
बेदिल हैदरी
ये जो चेहरों पे लिए गर्द-ए-अलम आते हैं
बेदिल हैदरी
रौनक़ फ़रोग़-ए-दर्द से कुछ अंजुमन में है
बेबाक भोजपुरी
मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल
बयान मेरठी
कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
क़रार पाते हैं आख़िर हम अपनी अपनी जगह
बासिर सुल्तान काज़मी
यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी
बशीर ज़ैदी असीर
मिरे बदन में छुपी आग को हवा देगा
बशीर फ़ारूक़ी
सब लोग अपने अपने ख़ुदाओं को लाए थे
बशीर बद्र
प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ
बशीर बद्र
इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
बशीर बद्र
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
बशीर बद्र
दिल उजड़ी हुई एक सराए की तरह है
बशीर बद्र
वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे
बशीर बद्र
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
बशीर बद्र
सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
बशीर बद्र
सोए कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोए थे
बशीर बद्र
मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा
बशीर बद्र
मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा
बशीर बद्र
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
बशीर बद्र
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