लोग Poetry (page 52)

कुछ भी कहो सब अपनी अनाओं पे अड़े हैं

असग़र आबिद

इश्क़ से लोग मना करते हैं

असर लखनवी

जो लोग डरते हैं रातों को अपने साए से

असर अकबराबादी

जाने क्यूँ लोग ग़म से डरते हैं

असर अकबराबादी

मलाल-ए-हिज्र नहीं रंज-ए-बे-रुख़ी भी नहीं

असद जाफ़री

जब अपने पैरहन से ख़ुशबू तुम्हारी आई

असद भोपाली

सब इक चराग़ के परवाने होना चाहते हैं

असअ'द बदायुनी

बहुत से लोगों को मैं भी ग़लत समझता हूँ

असअ'द बदायुनी

जो लोग रातों को जागते थे

असअ'द बदायुनी

हम अहल-ए-ख़ौफ़

असअ'द बदायुनी

ये लोग ख़्वाब बहुत कर्बला के देखते हैं

असअ'द बदायुनी

ये धूप छाँव के असरार क्या बताते हैं

असअ'द बदायुनी

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से

असअ'द बदायुनी

सब इक चराग़ के परवाने होना चाहते हैं

असअ'द बदायुनी

रौशनी में किस क़दर दीवार-ओ-दर अच्छे लगे

असअ'द बदायुनी

मिरे लोग ख़ेमा-ए-सब्र में मिरे शहर गर्द-ए-मलाल में

असअ'द बदायुनी

कहते हैं लोग शहर तो ये भी ख़ुदा का है

असअ'द बदायुनी

जो अक्स-ए-यार तह-ए-आब देख सकते हैं

असअ'द बदायुनी

बड़े नादान थे हम रेत को आब-ए-रवाँ समझे

असअ'द बदायुनी

गो सरापा-ए-जब्र हैं फिर भी

आरज़ू सहारनपुरी

हमें मिट के भी ये हसरत कि भटकते उस गली में

अरशद सिद्दीक़ी

न पयाम चाहते हैं न कलाम चाहते हैं

अरशद सिद्दीक़ी

हम तो न घर में आप के दम-भर ठहरने आएँ

अरशद अली ख़ान क़लक़

सितम वो तुम ने किए भूले हम गिला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

हम तो हों दिल से दूर रहें पास और लोग

अरशद अली ख़ान क़लक़

दफ़्तर जो गुलों के वो सनम खोल रहा है

अरशद अली ख़ान क़लक़

बुत-परस्ती ने किया आशिक़-ए-यज़्दाँ मुझ को

अरशद अली ख़ान क़लक़

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़

कोई भी शय हो मियाँ जान से प्यारी किसे है

अरशद अब्दुल हमीद

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