गंतव्य Poetry (page 14)

ख़लीलुर्रहमान आज़मी की याद में

शहरयार

ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है

शहरयार

ये क्या हुआ कि तबीअ'त सँभलती जाती है

शहरयार

तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

शहरयार

किस फ़िक्र किस ख़याल में खोया हुआ सा है

शहरयार

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

दाम-ए-उल्फ़त से छूटती ही नहीं

शहरयार

किताब गुमराह कर रही है

शहराम सर्मदी

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की दवा मैं क्या करता

शहनवाज़ ज़ैदी

किसी बंजर तख़य्युल पर किसी बे-आब रिश्ते में

शहनवाज़ ज़ैदी

वो क्यूँ आया

शाहिद मलिक

दूर सहरा में जहाँ धूप शजर रखती है

शाहिद लतीफ़

मैं कहाँ तक तुझे सफ़ाई दूँ

शाहिद कमाल

मिरी नज़र कि तरह दिल परिंद ओझल है

शाहिद जमील

फूलों से सज गई कहीं सब्ज़ा पहन लिया

शाहिद जमाल

लुत्फ़ से तेरे सिवा दर्द महक जाता है

शाहिद इश्क़ी

इक न आने वाले का इंतिज़ार करते हैं

शाहिद इश्क़ी

किस क़दर है मुहीब सन्नाटा

शाहिद फ़रीद

मोहब्बत मुझ से कहती थी ज़रा होश्यार दामन से

शाहिद भोपाली

ऐ निगार-ए-ग़म-ओ-आलाम तिरी उम्र दराज़

शाहिद अहमद शोएब

ये हम कौन हैं

शाहीन मुफ़्ती

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

याद उस की है कुछ ऐसी कि बिसरती भी नहीं

शहाब जाफ़री

शाम रखती है बहुत दर्द से बेताब मुझे

शहाब जाफ़री

मैं ही मैं बिखरा हुआ हूँ राह-ता-मंज़िल तमाम

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

सरज़मीन-ए-ज़ुल्फ़ में क्या दिल ठिकाने लग गया

शाह नसीर

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