गंतव्य Poetry (page 15)

रख क़दम होश्यार हो कर इश्क़ की मंज़िल में आह

शाह नसीर

यारो नहीं इतना मुझे क़ातिल ने सताया

शाह नसीर

तिरे है ज़ुल्फ़ ओ रुख़ की दीद सुब्ह-ओ-शाम आशिक़ का

शाह नसीर

शब जो रुख़-ए-पुर-ख़ाल से वो बुर्के को उतारे सोते हैं

शाह नसीर

सरज़मीन-ए-ज़ुल्फ़ में क्या दिल ठिकाने लग गया

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

जो गुज़रे है बर आशिक़-ए-कामिल नहीं मालूम

शाह नसीर

बदन-दरीदा-ओ-बे-बर्ग-ओ-बार होना भी

शाह हुसैन नहरी

चर्चे हर इक ज़बान पे हुस्न-ए-बुताँ के हैं

शाग़िल क़ादरी

बला जाने किसी की हिज्र में इस दिल पे क्या गुज़री

शाग़िल क़ादरी

लोग हैं मुंतज़िर-ए-नूर-ए-सहर मुद्दत से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ख़राबे में बसर कर गए ख़ामोशी से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

बरसी हैं वो आँखें कि न बादल कभी बरसे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

सर में एक सौदा था बाम-ओ-दर बनाने का

शफ़ीक़ सलीमी

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

शफ़ीक़ जौनपुरी

ऐसी नींद आई कि फिर मौत को प्यार आ ही गया

शफ़ीक़ जौनपुरी

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

कहीं कुछ और भी है ख़्वाहिश-ए-दिगर के बा'द

शफ़क़ सुपुरी

दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है

शायर फतहपुरी

लिल्लाह कोई कोशिश न करे उल्फ़त में मुझे समझाने की

शादाँ इंदौरी

जान जोखिम से किए सर जो मराहिल तू ने

शादाब उल्फ़त

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से

शाद लखनवी

बद-गुमानी जो हुई शम्अ' से परवाने को

शाद लखनवी

ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम

शाद अज़ीमाबादी

सफ़र की आख़िरी मंज़िल के राहबर हम हैं

शबनम शकील

क़फ़स को ले के उड़ना पड़ रहा है

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

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