नाम Poetry (page 20)

पत्थर की भूरी ओट में लाला खिला था कल

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

कनार-ए-बहर है देखूँगा मौज-ए-आब में साँप

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

कुछ इस तरह वो निगाहें चुराए जाते हैं

शम्स ज़ुबैरी

न कोई अपना ग़म है और न अब कोई ख़ुशी अपनी

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

नींद आँखों में समो लूँ तो सियह रात कटे

शमीम तारिक़

रूह को अपनी तह-ए-दाम नहीं कर सकता

शमीम रविश

ज़हर को मय दिल-ए-सद-पारा को मीना न कहो

शमीम करहानी

ये दौर-ए-अहल-ए-हवस है करम से काम न ले

शमीम जयपुरी

साहिल पे लाई और सफ़ीने डुबो दिए

शमीम जयपुरी

इस इल्तिफ़ात पर कोई दामन न थाम ले

शमीम जयपुरी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

ज़िंदगी हँसती है सुब्ह-ओ-शाम तेरे शहर में

शमीम फ़तेहपुरी

रुकने का अब नाम न ले है राही चलता जाए है

शमीम अनवर

उसे न मिलने की सोचा है यूँ सज़ा देंगे

शमीम अब्बास

उस से गिले शिकायतें शिकवे भी छोड़ दो

शकील शम्सी

ज़िंदगी और मौत का यूँ राब्ता रह जाएगा

शकील सरोश

शाम मिरी कमज़ोरी है

शकील जाज़िब

अल्फ़ाज़ नर्म हो गए लहजे बदल गए

शकील जमाली

ये सिलसिला ग़मों का न जाने कहाँ से है

शकील ग्वालिआरी

हम कब उस राह से गुज़रते हैं

शकील ग्वालिआरी

न पैमाने खनकते हैं न दौर-ए-जाम चलता है

शकील बदायुनी

छुपे हैं लाख हक़ के मरहले गुम-नाम होंटों पर

शकील बदायुनी

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया

शकील बदायुनी

ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है

शकील बदायुनी

ये ऐश-ओ-तरब के मतवाले बे-कार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

उन के बग़ैर हम जो गुलिस्ताँ में आ गए

शकील बदायुनी

तिरी अंजुमन में ज़ालिम अजब एहतिमाम देखा

शकील बदायुनी

सुब्ह का अफ़्साना कह कर शाम से

शकील बदायुनी

रौशनी साया-ए-ज़ुल्मात से आगे न बढ़ी

शकील बदायुनी

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