नाम Poetry (page 18)
तिरी निगाह ने अपना बना के छोड़ दिया
शेवन बिजनौरी
मौसम भी ख़ुश-गवार ज़माना भी रास है
शेवन बिजनौरी
अभी तो दिल में हल्की सी ख़लिश महसूस होती है
शेरी भोपाली
ग़ज़ब है जुस्तजू-ए-दिल का ये अंजाम हो जाए
शेरी भोपाली
ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है
शेर सिंह नाज़ देहलवी
रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक है 'ज़ौक़'
ज़ौक़
मालूम जो होता हमें अंजाम-ए-मोहब्बत
ज़ौक़
तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं
ज़ौक़
मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
ज़ौक़
कोई कमर को तिरी कुछ जो हो कमर तो कहे
ज़ौक़
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
ज़ौक़
जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर
ज़ौक़
दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से
ज़ौक़
चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे
ज़ौक़
बलाएँ आँखों से उन की मुदाम लेते हैं
ज़ौक़
अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो
ज़ौक़
रंजिश तिरी हर दम की गवारा न करेंगे
शैख़ अली बख़्श बीमार
आख़िर तुम्हारे इश्क़ में बर्बाद हो सके
शहज़ाद रज़ा लम्स
रेख़्ता का इक नया मज्ज़ूब है 'शहपर' रसूल
शहपर रसूल
ज़हर-ए-शब वीरान बिस्तर ऐ ख़ुदा
शहपर रसूल
मस्लहत के ज़ावियों से किस क़दर अंजान है
शहपर रसूल
हँसते हुए हुरूफ़ में जिस को अदा करूँ
शहपर रसूल
दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया
शहपर रसूल
चुप गुज़र जाता हूँ हैरान भी हो जाता हूँ
शहपर रसूल
शायद इसी का नाम मोहब्बत है 'शेफ़्ता'
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
हम तालिब-ए-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कुछ दर्द है मुतरिबों की लय में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा
शीन काफ़ निज़ाम
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