नज़र Poetry (page 46)

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

वो दिल से तंग आ के आज महफ़िल में हुस्न की तमकनत की ख़ातिर

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

कभी कभी अर्ज़-ए-ग़म की ख़ातिर हम इक बहाना भी चाहते हैं

सलाम मछली शहरी

हम ऐसे लोग जल्द असीर-ए-ख़िज़ाँ हुए

सलाम मछली शहरी

हवा ज़माने की साक़ी बदल तो सकती है

सलाम मछली शहरी

घर की दीवारों को हम ने और ऊँचा कर लिया

सलाहुद्दीन नदीम

दुआओं में असर बाक़ी न आहों में असर बाक़ी

सज्जाद शम्सी

वो माह-वश है ज़मीं पर नज़र झुकाए हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शो'ला सा कोई बर्क़-ए-नज़र से नहीं उठता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

फ़रेब था अक़्ल-ओ-आगही का कि मेरी फ़िक्र-ओ-नज़र का धोका

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जलती हवाएँ कह गईं अज़्म-ए-सबात छोड़ दे

सज्जाद बाबर

भटकी है उजालों में नज़र शाम से पहले

सज्जाद बाबर

मी-यौमिल-हिसाब

साजिदा ज़ैदी

इक सवाल ख़ुदा-ए-बरतर से

साजिदा ज़ैदी

दौर उफ़्तादगी

साजिदा ज़ैदी

वफ़ा-ओ-मेहर-ओ-अल्ताफ़-ओ-करम थे हम-इनाँ क्या क्या

साजिदा ज़ैदी

रात गहरी है तो फिर ग़म भी फ़रावाँ होंगे

साजिदा ज़ैदी

शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

जज़्बा-ए-इश्क़ भी है गर्मी-ए-बाज़ार भी है

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

हर तरफ़ धूप की चादर को बिछाने वाला

साजिद प्रेमी

आप इज़्ज़त-मआब सच-मुच के

साजिद प्रेमी

रूह को पहले ख़ाकसार किया

साजिद हमीद

मेरी आँखों में नूर भर देना

साजिद हमीद

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

बर-सर-ए-दर्द ज़माने का भी सोचा जाए

साइम जी

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