नज़र Poetry (page 59)

दिल छोड़ के हर राहगुज़र ढूँढ रहा हूँ

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

क्या क्या गुमाँ न थे मुझे अपनी उड़ान पर

रहमान ख़ावर

दिल है अपना न अब जिगर दर-पेश

रहमान जामी

आगही जिस मक़ाम पर ठहरी

रहमान जामी

ये अमल मौजा-ए-अन्फ़ास का धोका ही न हो

रहमान हफ़ीज़

दिल की बर्बादी के आसार अभी बाक़ी हैं

राही शहाबी

बे-नाम सी ख़लिश कि जो दिल में जिगर में है

राही शहाबी

अश्क आँखों में और दिल में आहों के शरर देखे

राही शहाबी

लहू आँखों में रौशन है ये मंज़र देखना अब के

राही कुरैशी

तल्ख़-ओ-तुर्श

राही मासूम रज़ा

रास्ते अपनी नज़र बदला किए

राही मासूम रज़ा

रंग हवा से छूट रहा है मौसम-ए-कैफ़-ओ-मस्ती है

राही मासूम रज़ा

मौज-ए-हवा की ज़ंजीरें पहनेंगे धूम मचाएँगे

राही मासूम रज़ा

लोग यक-रंगी-ए-वहशत से भी उकताए हैं

राही मासूम रज़ा

सुनो तो आरिज़ा-ए-इख़तिलाज रहने दो

राही फ़िदाई

मुतालेआ की हवस है किताब दे जाओ

राही फ़िदाई

मता-ओ-माल-ए-हवस हुब्ब-ए-आल सामने है

राही फ़िदाई

ख़ुद को मुम्ताज़ बनाने की दिली-ख़्वाहिश में

राही फ़िदाई

कभी किसी से न हम ने कोई गिला रक्खा

इरफ़ान सत्तार

ग़मों में कुछ कमी या कुछ इज़ाफ़ा कर रहे हैं

इरफ़ान सत्तार

एक दुनिया की कशिश है जो इधर खींचती है

इरफ़ान सत्तार

आज बाम-ए-हर्फ़ पर इम्कान भर मैं भी तो हूँ

इरफ़ान सत्तार

अपने ग़रीब दिल की बात करते हैं राएगाँ कहाँ

इरम लखनवी

मैं कि वक़्फ़-ए-ग़म-ए-दौराँ न हुआ था सो हुआ

इक़बाल उमर

उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़गार में

इक़बाल सुहैल

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से

इक़बाल सुहैल

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा

इक़बाल सुहैल

अंजाम-ए-वफ़ा भी देख लिया अब किस लिए सर ख़म होता है

इक़बाल सुहैल

दरवेश नज़र आता था हर हाल में लेकिन

इक़बाल साजिद

तुम मुझे भी काँच की पोशाक पहनाने लगे

इक़बाल साजिद

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