पास Poetry (page 32)
दुश्मन ब-नाम-ए-दोस्त बनाना मुझे भी है
बिल्क़ीस ख़ान
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी
भवेश दिलशाद
दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
मैं क्या बताऊँ कैसी परेशानियों में हूँ
भारत भूषण पन्त
अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है
भारत भूषण पन्त
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं
बेख़ुद देहलवी
दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा
बेख़ुद देहलवी
नाले में कभी असर न आया
बेखुद बदायुनी
हर एक लहज़ा मिरी धड़कनों में चुभती थी
बेकल उत्साही
रहीन-ए-आस रही है न महव-ए-यास रही
बेकल उत्साही
लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी
बहज़ाद लखनवी
तूर वाले तिरी तनवीर लिए बैठे हैं
बेदम शाह वारसी
तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो
बेदम शाह वारसी
पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो
बेदम शाह वारसी
सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ
बयान मेरठी
लहू टपका किसी की आरज़ू से
बयान मेरठी
दिल अब उस दिल-शिकन के पास कहाँ
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
चमकी थी एक बर्क़ सी फूलों के आस-पास
बासिर सुल्तान काज़मी
हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं
बासिर सुल्तान काज़मी
बादल है और फूल खिले हैं सभी तरफ़
बासिर सुल्तान काज़मी
चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी
बशीर ज़ैदी असीर
हम तेरे पास आ के परेशान हैं बहुत
बशीर फ़ारूक़ी
मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा
बशीर फ़ारूक़ी
अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
बशीर फ़ारूक़ी
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
बशीर बद्र
वो अपने घर चला गया अफ़्सोस मत करो
बशीर बद्र
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ
बशीर बद्र
हमारे पास तो आओ बड़ा अंधेरा है
बशीर बद्र
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