पास Poetry (page 33)
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
बशीर बद्र
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
बशीर बद्र
आहन में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी
बशीर बद्र
वक़्त के पास हैं कुछ तस्वीरें
बाक़ी सिद्दीक़ी
उन का या अपना तमाशा देखो
बाक़ी सिद्दीक़ी
उड़े नहीं हैं उड़ाए हुए परिंदे हैं
बाक़ी अहमदपुरी
इस लब से रस न चूसे क़दह और क़दह से हम
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ैरत-ए-गुल है तू और चाक-गरेबाँ हम हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
जहन्नम
बाक़र मेहदी
धरती का बोझ
बाक़र मेहदी
शायद
बलराज कोमल
हमें रास आनी है राहों की गठरी
बकुल देव
याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में
ज़फ़र
नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
ज़फ़र
क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर
ज़फ़र
आसमाँ पर काले बादल छा गए
बद्र-ए-आलम ख़लिश
हर शख़्स को गुमान कि मंज़िल नहीं है दूर
बद्र वास्ती
टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा
बदनाम नज़र
किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा
बाबर रहमान शाह
इस ज़िंदगी के बदले
अज़रा अब्बास
हाथ खोल दिए जाएँ
अज़रा अब्बास
अब कौन सी मता-ए-सफ़र दिल के पास है
अज़ीज़ तमन्नाई
दिल में वो दर्द उठा रात कि हम सो न सके
अज़ीज़ तमन्नाई
अब कौन सी मता-ए-सफ़र दिल के पास है
अज़ीज़ तमन्नाई
कावाक
अज़ीज़ क़ैसी
ग़रीब शहर
अज़ीज़ क़ैसी
बैन-उल-अदमैन
अज़ीज़ क़ैसी
मिटा के अंजुमन-ए-आरज़ू सदा दी है
अज़ीज़ क़ैसी
परिंदे झील पर इक रब्त-ए-रूहानी में आए हैं
अज़ीज़ नबील
बिखेरता है क़यास मुझ को
अज़ीज़ नबील
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