पत्थर Poetry (page 26)

हज़ारों साल की थी आग मुझ में

फ़े सीन एजाज़

समुंदर सर पटक कर मर रहा था

फ़े सीन एजाज़

उस की गली में ज़र्फ़ से बढ़ कर मिला मुझे

फ़व्वाद अहमद

तुम्हारे लिए मुस्कुराती सहर है

फ़व्वाद अहमद

क्यूँ मसाफ़त में न आए याद अपना घर मुझे

फ़ौक़ लुधियानवी

ज़ख़्मी उँगलियों से एक नज़्म

फ़ातिमा हसन

सुब्ह होती है तो दफ़्तर में बदल जाता है

फ़रियाद आज़र

गली का पत्थर था मुझ में आया बिगाड़ ऐसा

फ़रताश सय्यद

तन्हा छोड़ के जाने वाले इक दिन पछताओगे

फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी

यूँ मुसल्लत तो धुआँ जिस्म के अंदर तक है

फ़र्रुख़ जाफ़री

राह-ए-गुम-कर्दा सर-ए-मंज़िल भटक कर आ गया

फ़र्रुख़ जाफ़री

मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें

फ़र्रुख़ जाफ़री

वो अलग चुप है ख़ुद से शर्मा कर

फ़ारूक़ शफ़क़

फिर पहाड़ों से उतर कर आएँगे

फ़ारूक़ नाज़की

हिसार-ए-जिस्म से आगे निकल गया होता

फ़ारूक़ नाज़की

दर्द की रात गुज़रती है मगर आहिस्ता

फ़ारूक़ नाज़की

इक पल कहीं रुके थे सफ़र याद आ गया

फ़ारूक़ बख़्शी

अब धूप मुक़द्दर हुई छप्पर न मिलेगा

फ़ारूक़ अंजुम

मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

जंगल उगा था हद्द-ए-नज़र तक सदाओं का

फ़ारिग़ बुख़ारी

नहीं है अब कोई रस्ता नहीं है

फ़रहत शहज़ाद

हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते

फ़रहत शहज़ाद

इश्क़ में पीने का पानी बस आँख का पानी

फ़रहत एहसास

पीला कुत्ता

फ़रहत एहसास

मिरी मोहब्बत में सारी दुनिया को इक खिलौना बना दिया है

फ़रहत एहसास

मेरी मिट्टी का नसब बे-सर-ओ-सामानी से

फ़रहत एहसास

मिरे शे'रों में फ़नकारी नहीं है

फ़रहत एहसास

बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला

फ़रहत एहसास

अहल-ए-बदन को इश्क़ है बाहर की कोई चीज़

फ़रहत एहसास

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

फ़रीद इशरती

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