पत्थर Poetry (page 9)

मुश्तइ'ल हो गया वो ग़ुंचा-दहन दानिस्ता

शम्स रम्ज़ी

वजूद-ए-बर्क़ ज़रूरी है गुलिस्ताँ के लिए

शम्स इटावी

ये घर जो हमारे लिए अब दश्त-ए-जुनूँ है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

पहुँचा मैं कू-ए-यार में जब सर लिए हुए

शमीम तारिक़

महबूब सा अंदाज़-ए-बयाँ बे-अदबी है

शमीम तारिक़

लोग क्यूँ ढूँड रहे हैं मुझे पत्थर ले कर

शमीम तारिक़

किसी से पूछें कौन बताए किस ने महशर देखा है

शमीम तारिक़

हिचकियाँ लेता हुआ दुनिया से दीवाना चला

शमीम तारिक़

पलकों पे सितारा सा मचलने के लिए था

शमीम रविश

दीवार की सूरत था कभी दर की तरह था

शमीम रविश

फ़ज़ा-ए-नम में सदाओं का शोर हो जाए

शमीम क़ासमी

बे-ख़बर फूल को भी खींच के पत्थर पे न मार

शमीम करहानी

पी ले जो लहू दिल का वो इश्क़ की मस्ती है

शमीम करहानी

ग़म दो आलम का जो मिलता है तो ग़म होता है

शमीम करहानी

शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा

शमीम हनफ़ी

शाम आई सेहन-ए-जाँ में ख़ौफ़ का बिस्तर लगा

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

बस एक वहम सताता है बार बार मुझे

शमीम हनफ़ी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

जो चेहरे के बाहर है वो अंदर न मिलेगा

शमीम अनवर

अपना साया देख कर मैं बे-तहाशा डर गया

शमीम अनवर

संग मजनूँ पे लड़कपन में उठाया क्यूँ था

शकील शम्सी

धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है

शकील आज़मी

अजीब मंज़र है बारिशों का मकान पानी में बह रहा है

शकील आज़मी

आ के पत्थर तो मिरे सेहन में दो-चार गिरे

शकेब जलाली

रात के पिछले पहर

शकेब जलाली

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