रास्ता Poetry (page 31)

और मोड़ ने कहा

साबिर दत्त

रक्खे हर इक क़दम पे जो मुश्किल की आगही

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

रवाँ है क़ाफ़िला-ए-रूह-ए-इलतिफ़ात अभी

सबा अकबराबादी

इश्क़ आता न अगर राह-नुमाई के लिए

सबा अकबराबादी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें

सबा अकबराबादी

ग़ालिबन मेरे अलावा कोई गुज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

चला-चल मोहलत-ए-आराम क्या है

सबा अकबराबादी

लुटा के राह-ए-मोहब्बत में हर ख़ुशी मैं ने

सबा अफ़ग़ानी

नाव काग़ज़ की सही कुछ तो नज़र से गुज़रे

सादुल्लाह कलीम

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

याद आते हो किस सलीक़े से

रूही कंजाही

हर तल्ख़ हक़ीक़त का इज़हार भी करना है

रूही कंजाही

चैन घर में न कभी तेरे नगर में पाऊँ

रूही कंजाही

शुऊर-ए-इश्क़ अगर फ़ितरत-ए-निगाह में है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

निकालो कोई तो सूरत कि तीरगी कम हो

रोहित सोनी ‘ताबिश’

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

इसी लिबास इसी पैरहन में रहना है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

ज़रूर पाँव में अपने हिना वो मल के चले

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कहाँ से हम गए हैं कहाँ कहें क्या तिरी तग-ओ-ताज़ में

रियाज़ ख़ैराबादी

पाया जो तुझे तो खो गए हम

रियाज़ ख़ैराबादी

ले गया घर से उन्हें ग़ैर के घर का ता'वीज़

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई पूछे न हम से क्या हुआ दिल

रियाज़ ख़ैराबादी

आरज़ू भी तो कर नहीं आती

रियाज़ ख़ैराबादी

सर-ए-राह इक हादिसा हो गया

ऋषि पटियालवी

रास्ता रोक के कह लूँगा जो कहना है मुझे

रिन्द लखनवी

ज़माने में वो मह-लक़ा एक है

रिन्द लखनवी

यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ

रिन्द लखनवी

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

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