रात Poetry (page 80)

इधर महसूस होती है कमी उस की

अज़हर अब्बास

मैं सोचता हूँ सबक़ मैं ने वो पढ़ा ही नहीं

अज़ीज़ परीहारी

किस से पूछें रात-भर अपने भटकने का सबब

आज़ाद गुलाटी

उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर

आज़ाद गुलाटी

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

दिन में इस तरह मिरे दिल में समाया सूरज

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

इबारतें चमक रही हैं दिल में तेरे प्यार की

आयुष चराग़

मोहब्बत का एक साल

अय्यूब ख़ावर

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच

अय्यूब ख़ावर

अब तो आए नज़र में जो भी हो

अय्यूब ख़ावर

आ जाए न रात कश्तियों में

अय्यूब ख़ावर

दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं

अयाज़ झाँसवी

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

घुटी घुटी सी फ़ज़ा में शगुफ़्तगी तो मिली

औलाद अली रिज़वी

वो रात नींद की दहलीज़ पर तमाम हुई

अतीक़ुल्लाह

वो

अतीक़ुल्लाह

कुछ और दिन अभी उस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

कुछ और दिन अभी इस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए

अतीक़ुल्लाह

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना

आतिफ़ ख़ान

सूरज लिहाफ़ ओढ़ के सोया तमाम रात

अतहर नासिक

पहुँचा दिया उमीद को तूफ़ान-ए-यास तक

अतहर नासिक

ख़ुद को किसी की राह-गुज़र किस लिए करें

अतहर नासिक

ख़ुद को किसी की राहगुज़र किस लिए करें

अतहर नासिक

चुप-चाप हब्स-ए-वक़्त के पिंजरे में मर गया

अतहर नासिक

साया मेरा साया वो

अतहर नफ़ीस

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