रात Poetry (page 94)

शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर

अख़्तर होशियारपुरी

न जब कोई शरीक-ए-ज़ात होगा

अख़्तर होशियारपुरी

मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

मैं उस का नाम घुले पानियों पे लिखता क्या

अख़्तर होशियारपुरी

जो मुझ को देख के कल रात रो पड़ा था बहुत

अख़्तर होशियारपुरी

कौन सुनता है सिर्फ़ ज़ात की बात

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

ये सनम रिवायत-ओ-नक़्ल के हुबल-ओ-मनात से कम नहीं

अख़्तर अंसारी

फूल सूँघे जाने क्या याद आ गया

अख़्तर अंसारी

किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

अख़्तर अंसारी

बहार आई ज़माना हुआ ख़राबाती

अख़्तर अंसारी

ये दिल कहता है कोई आ रहा है

अख़्तर अमान

इधर चराग़ जल गए उधर चराग़ जल गए

अख़लाक़ बन्दवी

शब-ए-ज़ुल्मत

अख़लाक़ अहमद आहन

काग़ज़ प हर्फ़ हर्फ़ निखर जाना चाहिए

अखिलेश तिवारी

हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर

अखिलेश तिवारी

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

ख़ुद से निकलूँ भी तो रस्ता नहीं आसान मिरा

अकबर मासूम

ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो

अकबर मासूम

लुटाऊँ मस्तियाँ सरसब्ज़ रहगुज़र की तरह

अकबर काज़मी

नए ख़ौफ़ का आज़ार

अकबर हैदराबादी

हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था

अकबर हैदराबादी

तमाम आलम-ए-इम्काँ मिरे गुमान में है

अकबर हमीदी

रह-ए-गुमाँ से अजब कारवाँ गुज़रते हैं

अकबर हमीदी

काफ़िर था मैं ख़ुदा का न मुंकिर दुआ का था

अकबर हमीदी

वस्ल हो या फ़िराक़ हो 'अकबर'

अकबर इलाहाबादी

उन्हें भी जोश-ए-उल्फ़त हो तो लुत्फ़ उट्ठे मोहब्बत का

अकबर इलाहाबादी

यूँ मिरी तब्अ से होते हैं मआनी पैदा

अकबर इलाहाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

अकबर इलाहाबादी

फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी

अकबर इलाहाबादी

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