रात Poetry (page 96)

रात अभी आधी गुज़री है

ऐन ताबिश

हवेली मौत की दहलीज़ पर

ऐन ताबिश

इक शहर था इक बाग़ था

ऐन ताबिश

अदम से परे

ऐन ताबिश

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ऐन ताबिश

गुज़रते वक़्त को बुनियाद करने वाला हूँ

ऐन ताबिश

शहर

ऐन रशीद

करता है कार-ए-रौशनी मुझ को जला के दिन

ऐन इरफ़ान

हो दिन कि चाहे रात कोई मसअला नहीं

ऐन इरफ़ान

क़ल्ब की बंजर ज़मीं पर ख़्वाहिशें बोते हुए

ऐन इरफ़ान

हो दिन कि चाहे रात कोई मसअला नहीं

ऐन इरफ़ान

सब के आँगन झाँकने वाले हम से ही क्यूँ बैर तुझे

अहसन यूसुफ़ ज़ई

ये किस करनी का फल होगा कैसी रुत में जागे हम

अहसन यूसुफ़ ज़ई

हमारी साँसें मिली हैं गिन के

अहसन यूसुफ़ ज़ई

ज़ेहन का सफ़र तन्हा दिल की रहगुज़र तन्हा

अहसन रिज़वी दानापुरी

मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है

अहसन मारहरवी

क्यूँ चुप हैं वो बे-बात समझ में नहीं आता

अहसन मारहरवी

जब तक अपने दिल में उन का ग़म रहा

अहसन मारहरवी

इलाज-ए-हसरत-ए-दिल-गीर कर रहा हूँ मैं

अहसन लखनवी

होता है दिन-रात यहाँ अब झगड़ा भाई भाई में

अहसन इमाम अहसन

इश्क़ में बर्बाद होने के सिवा रक्खा न था

अहमद निसार

इल्म की ज़रूरत

अहमक़ फफूँदवी

मिला जो धूप का सहरा बदन शजर न बना

अहमद ज़िया

फ़िक्र के सारे धागे टूटे ज़ेहन भी अब म'अज़ूर हुआ

अहमद ज़िया

पाताल ज़मीन आसमान

अहमद ज़फ़र

काएनात-ए-ज़ात का मुसाफ़िर

अहमद ज़फ़र

यूँ ज़माने में मिरा जिस्म बिखर जाएगा

अहमद ज़फ़र

तन्हाई ने पर फैलाए रात ने अपनी ज़ुल्फ़ें

अहमद ज़फ़र

सियाह रात की हर दिलकशी को भूल गए

अहमद ज़फ़र

मैं यूँ तो नहीं है कि मोहब्बत में नहीं था

अहमद ज़फ़र

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