रास्ता Poetry (page 12)

मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

शाम परिंदे लौट आए तो हम तिरी खोज में चल निकले

अज़हर अली

सब बातें ला-हासिल ठहरीं सारे ज़िक्र फ़ुज़ूल गए

अज़हर अली

ग़ज़ल उस के लिए कहते हैं लेकिन दर-हक़ीक़त हम

अज़हर अदीब

कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख

अज़हर अदीब

जगह फूलों की रखते हैं घना साया बनाते हैं

अज़हर अदीब

अपना जैसा भी हाल रक्खा है

अज़हर अदीब

चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी

अय्यूब ख़ावर

न पूछो कैसे शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है

औलाद अली रिज़वी

ये रहबर आज भी कितने पुराने लगते हैं

अतुल अजनबी

जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था

असलम कोलसरी

जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था

असलम कोलसरी

दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं

असलम कोलसरी

कभी ऐसा तमव्वुज तुम ने देखा है

असलम अंसारी

मुझे तो ये भी फ़रेब-ए-हवास लगता है

असलम अंसारी

हर शख़्स इस हुजूम में तन्हा दिखाई दे

असलम अंसारी

दिल-गिरफ़्ता हूँ जहाँ-शाद हूँ मैं

आसिफ़ रज़ा

यहीं कहीं कोई आवाज़ दे रहा था मुझे

अशफ़ाक़ हुसैन

इतना बे-नफ़अ नहीं उस से बिछड़ना मेरा

अशफ़ाक़ हुसैन

सफ़र से लौट आने वाली हवा

असग़र नदीम सय्यद

हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए

असग़र गोरखपुरी

चलते चलते रुक जाता है

असग़र गोरखपुरी

एक नज़्म

असअ'द बदायुनी

बरसों भटका किया और फिर भी न उन तक पहुँचा

आरज़ू लखनवी

वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था

आरज़ू लखनवी

ख़ुदी के ज़ो'म में ऐसा वो मुब्तला हुआ है

अरशद महमूद अरशद

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