प्रकाश Poetry (page 33)

मिरे चराग़ बुझ गए

अली अकबर नातिक़

हरीम-ए-दिल, कि सर-ब-सर जो रौशनी से भर गया

अली अकबर नातिक़

इक सदा की सूरत हम इस हवा में ज़िंदा हैं

अली अकबर अब्बास

ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे

अली अकबर अब्बास

देखने में लगती थी भीगती सिमटती रात

अली अकबर अब्बास

अपने नाख़ुन अपने चेहरे पर ख़राशें दे गए

अली अकबर अब्बास

लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे

अली अहमद जलीली

कुछ कड़े टकराओ दे जाती है अक्सर रौशनी

अलीना इतरत

मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ

अलीना इतरत

अजनबी सा इक सितारा हूँ मैं सय्यारों के बीच

अलीना इतरत

नाज़िल हुआ था शहर में काला अज़ाब एक

अलीम सबा नवेदी

गिनती में बे-शुमार थे कम कर दिए गए

आलमताब तिश्ना

बहुत सुकून से रहते थे हम अँधेरे में

आलम ख़ुर्शीद

अब कितनी कार-आमद जंगल में लग रही है

आलम ख़ुर्शीद

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से

आलम ख़ुर्शीद

जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी

आलम ख़ुर्शीद

हवा भी चाहिए और रौशनी भी

अकरम नक़्क़ाश

क़रार-ए-गुम-शुदा मेरे ख़ुदा कब आएगा

अकरम नक़्क़ाश

लहू तेज़ाब करना चाहता है

अकरम नक़्क़ाश

प्यार इश्क़ हमदर्दी और दोस्ती साज़िश

अकमल इमाम

राह-ए-फ़रार

अख़्तर-उल-ईमान

ज़र-ए-नाब

अख़्तर उस्मान

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

अख्तर शुमार

पड़े थे हम भी जहाँ रौशनी में बिखरे हुए

अख्तर शुमार

इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा

अख़्तर शीरानी

ओ देस से आने वाले बता

अख़्तर शीरानी

बदनाम हो रहा हूँ

अख़्तर शीरानी

ख़यालिस्तान-ए-हस्ती में अगर ग़म है ख़ुशी भी है

अख़्तर शीरानी

इक अजब आलम है दिल का ज़िंदगी की राह में

अख्तर सईदी

जिस्मों से निकल रहे हैं साए

अख़्तर रज़ा सलीमी

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