साथ Poetry (page 14)
सुकूत-ए-शब में
तारिक़ क़मर
जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात
तारिक़ क़मर
हवा रुकी है तो रक़्स-ए-शरर भी ख़त्म हुआ
तारिक़ क़मर
ज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ
तारिक़ क़मर
उस ने इक बार भी पूछा नहीं कैसा हूँ मैं
तारिक़ क़मर
सारे ज़ख़्मों को ज़बाँ मिल गई ग़म बोलते हैं
तारिक़ क़मर
कैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोग
तारिक़ क़मर
अपनी पलकों के शबिस्तान में रक्खा है तुम्हें
तारिक़ क़मर
हवा में आए तो लौ भी न साथ ली हम ने
तारिक़ नईम
ब-नाम-ए-इश्क़ यही एक काम करते हैं
तारिक़ नईम
अपने दुखों का हम ने तमाशा नहीं किया
तारिक़ मतीन
नज़र का नश्शा बदन का ख़ुमार टूट गया
तारिक़ बट
कुछ दूर तक तो इस की सदा ले गई मुझे
तारिक़ बट
उठा लेता है अपनी एड़ियाँ जब साथ चलता है
तनवीर सिप्रा
दश्त में जो भी है जैसा मिरा देखा हुआ है
तनवीर सामानी
तिरी चाल धुन तिरी साँस सुर मिरे दिल को आ के सँभाल भी
तनवीर मोनिस
टूटी है ये कश्ती तो मिरे साथ सफ़र को
तनवीर अंजुम
राएगाँ सुब्ह की चिता पर
तनवीर अंजुम
हम दोनों में से एक
तनवीर अंजुम
लम्हा-ए-इमकान को पहलू बदलते देखना
तनवीर अंजुम
कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है
तनवीर अंजुम
इज़्हार-ए-जुनूँ बर-सर-ए-बाज़ार हुआ है
तनवीर अंजुम
दुखों के रूप बहुत और सुखों के ख़्वाब बहुत
तनवीर अंजुम
ज़ेहन ज़िंदा है मगर अपने सवालात के साथ
तनवीर अहमद अल्वी
क्या ज़रूरी है कोई बे-सबब आज़ार भी हो
तनवीर अहमद अल्वी
ख़्वाब तो ख़्वाब है ता'बीर बदल जाती है
तनवीर अहमद अल्वी
माल-ओ-ज़र की क़द्र क्या ख़ून-ए-जिगर के सामने
तालिब हुसैन तालिब
बेज़ार ज़िंदगी से दिल-ए-मुज़्महिल नहीं
तालिब चकवाली
रौनक़ें आबादियाँ क्या क्या चमन की याद हैं
तालिब अली खान ऐशी
न पहुँचा साथ यारान-ए-सफ़र की ना-तवानी से
तालिब अली खान ऐशी
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