साथ Poetry (page 12)

लहूलुहान समुंदर भी देखना है अभी

वाजिद क़ुरैशी

धुएँ की ओट से बाहर भी आ गया होता

वाजिद क़ुरैशी

कौन ये रौशनी को समझाए

वजद चुगताई

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

वहीद अख़्तर

तुम गए साथ उजालों का भी झूटा ठहरा

वहीद अख़्तर

सफ़र ही बाद-ए-सफ़र है तो क्यूँ न घर जाऊँ

वहीद अख़्तर

कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़

वहीद अख़्तर

अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे

वहीद अख़्तर

तन्हाई मुझे देखती है

वहीद अहमद

पचासी साल नीचे गिर गए

वहीद अहमद

क्या कहें क्या लिखें

वहीद अहमद

ख़ौफ़ नामा

वहीद अहमद

ख़ाके

वहीद अहमद

थकावटों से बैठ के सफ़र उतारिए कहीं

वहाब दानिश

वफ़ा की मंज़िलों को हम ने इस तरह सजा लिया

वफ़ा सिद्दीक़ी

तुम ने हमारा साथ दिया तो ख़ुद को हम पा जाएँगे

विश्वनाथ दर्द

हैं किस लिए उदास कोई पूछता नहीं

विश्वनाथ दर्द

अब हम चराग़ बन के सर-ए-राह जल उठे

विश्वनाथ दर्द

तख़्त-ए-ताऊस मिरा तख़्त-ए-हज़ारा तुम हो

विश्मा ख़ान विश्मा

सुकूत-ए-शब सितारों से हवा जब बात करती है

विश्मा ख़ान विश्मा

सय्याद आ गए हैं सभी एक घात पर

विश्मा ख़ान विश्मा

करना है कार-ए-ख़ैर तो फिर सर न देखना

विश्मा ख़ान विश्मा

लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा

विशाल खुल्लर

जुनूँ के बाब में अब के ये राएगानी हो

विपुल कुमार

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

विपुल कुमार

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

एक भी क़तरा न छोड़ा कीजिए

विलास पंडित मुसाफ़िर

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