साथ Poetry (page 11)

बुला रहे हो हमें भी मगर ख़याल रहे

वक़ार वासिक़ी

सलीक़ा बोलने का हो तो बोलो

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

मेरे होंटों का अभी ज़हर तिरे जिस्म में है

वक़ार ख़ान

देख पगली न दल लगा मिरे साथ

वक़ार ख़ान

ज़िंदगी इतनी बे-मज़ा क्यूँ है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

जो सोचते रहे वो कर गुज़रना चाहते हैं

वक़ार फ़ातमी

बरसों बा'द मिला तो उस ने हम से पूछा कैसे हो

वक़ार फ़ातमी

उन की चश्म-ए-मस्त में पोशीदा इक मय-ख़ाना था

वक़ार बिजनोरी

नज़र मिलते ही बरसे अश्क-ए-ख़ूँ क्यूँ दीदा-ए-तर से

वक़ार बिजनोरी

बदलती रहती हैं क़द्रें रहील-ए-वक़्त के साथ

वामिक़ जौनपुरी

ज़मीर

वामिक़ जौनपुरी

जमालियात

वामिक़ जौनपुरी

भूका बंगाल

वामिक़ जौनपुरी

तुझ से मिल कर दिल में रह जाती है अरमानों की बात

वामिक़ जौनपुरी

नए गुल खिले नए दिल बने नए नक़्श कितने उभर गए

वामिक़ जौनपुरी

हमारे मय-कदे का अब निज़ाम बदलेगा

वामिक़ जौनपुरी

कल तलक जो था तसव्वुर अंजुमन-आराइयों का

वलीउल्लाह वली

वहीं जी उठते हैं मुर्दे ये क्या ठोकर से छूना है

वलीउल्लाह मुहिब

मिरे दिल में हिज्र के बाब हैं तुझे अब तलक वही नाज़ है

वलीउल्लाह मुहिब

मा'रके में इश्क़ के सर से गुज़रने से न डर

वलीउल्लाह मुहिब

दिल-ए-ख़िल्क़त-ए-ख़ुदा को सनमा जला न चंदाँ

वलीउल्लाह मुहिब

बुलबुल बजाए अपने तुझे हम-नवा से बहस

वलीउल्लाह मुहिब

आना है तो आ जाओ यक आन मिरा साहब

वलीउल्लाह मुहिब

ख़ुदा किसी कूँ किसी साथ आश्ना न करे

वली उज़लत

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

क्या हिज्र में जी निढाल करना

वाली आसी

जी का जंजाल है इश्क़ मियाँ क़िस्सा ये तमाम करो 'वाली'

वाली आसी

यूँ तो तन्हाई में घबराए बहुत

वकील अख़्तर

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