साथ Poetry (page 9)

सारा बदन है ख़ून से क्यूँ तर उसे दिखा

युसूफ़ जमाल

पहले मैं तेरी नज़र में आया

यूसुफ़ हसन

चुप रहूँ कैसे मैं बर्बाद-ए-जहाँ होने तक

यूनुस ग़ाज़ी

इज्ज़ के साथ चले आए हैं हम 'यज़्दानी'

यज़दानी जालंधरी

ज़िंदा रहने का वो अफ़्सून-ए-अजब याद नहीं

यज़दानी जालंधरी

सूरज के साथ साथ उभारे गए हैं हम

यज़दानी जालंधरी

निगाह-ए-नाज़ का हासिल है ए'तिबार मुझे

यज़दानी जालंधरी

मिसाल-ए-अक्स मिरे आइने में ढलता रहा

यासमीन हमीद

किस की आँखों को नींद चुभती है

यासमीन हबीब

ख़ुद अपना साथ भी चुभने लगा था

यासमीन हबीब

कैसा चेहरा है रात की तफ़्सील

यासमीन हबीब

वक़्त बस रेंगता है उम्र के साथ

यासमीन हबीब

लम्स-ए-तिश्ना-लबी से गुज़री है

यासमीन हबीब

किसी के साथ किया निस्बत हुई थी

यासमीन हबीब

कुछ वक़्त अपने साथ गुज़ारूँगा मैं 'ज़मीर'

यासीन ज़मीर

ख़ुदा-रा आ के मिरी लो ख़बर कहाँ हो तुम

यासीन ज़मीर

शौक़ की कम-निगही भी है गवारा मुझ को

याक़ूब उस्मानी

चाहती है आख़िर क्या आगही ख़ुदा-मालूम

याक़ूब उस्मानी

न चारागर न मसीहा न राहबर था मैं

याक़ूब आरिफ़

क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी

याक़ूब आमिर

इक ख़ला सा है जिधर देखो इधर कुछ भी नहीं

याक़ूब आमिर

अगरचे हाल ओ हवादिस की हुक्मरानी है

याक़ूब आमिर

उस की याद और दर्द की सौग़ात मेरे साथ थी

यहया ख़ालिद

रौशनी का क़ालिब जब तीरगी में ढलता है

यहया ख़ालिद

दुनिया के साथ दीन की बेगार अल-अमाँ

यगाना चंगेज़ी

साया अगर नसीब हो दीवार-ए-यार का

यगाना चंगेज़ी

क़िस्सा किताब-ए-उम्र का क्या मुख़्तसर हुआ

यगाना चंगेज़ी

मजनूँ नहीं कि एक ही लैला के हो रहें

वज़ीर अली सबा लखनवी

महशर का हमें क्या ग़म इस्याँ किसे कहते हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

दाग़-ए-जुनूँ दिमाग़-ए-परेशाँ में रह गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

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