साथ Poetry (page 10)

बुत-परस्ती से न तीनत मिरी ज़िन्हार फिरी

वज़ीर अली सबा लखनवी

आया जो मौसम-ए-गुल तो ये हिसाब होगा

वज़ीर अली सबा लखनवी

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

वज़ीर आग़ा

मुसाफ़िर चलते रहते हैं

वज़ीर आग़ा

अब दिन की बातें करते हैं

वज़ीर आग़ा

सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना

वज़ीर आग़ा

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

वज़ीर आग़ा

ख़ुदा के सामने जो सर यक़ीं के साथ झुक जाए

वासिफ़ देहलवी

नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है

वासिफ़ देहलवी

अगर ख़ू-ए-तहम्मुल हो तो कोई ग़म नहीं होता

वासिफ़ देहलवी

डर मौत का न ख़ौफ़ किसी देवता का था

वसीम मीनाई

कल साथ था कोई तो दर ओ बाम थे रौशन

वसीम मलिक

जो शख़्स मिरा दस्त-ए-हुनर काट रहा है

वसीम मलिक

वहाँ अब जा के देखें हम से क्या इरशाद करते हैं

वसीम ख़ैराबादी

पत्थर नज़र थी वाइ'ज़-ए-ख़ाना-ख़राब की

वसीम ख़ैराबादी

जाए आशिक़ की बला हश्र में क्या रक्खा है

वसीम ख़ैराबादी

शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ

वसीम बरेलवी

मैं उस को पूज तो सकता हूँ छू नहीं सकता

वसीम बरेलवी

हम ये तो नहीं कहते कि हम तुझ से बड़े हैं

वसीम बरेलवी

बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें

वसीम बरेलवी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

वसीम बरेलवी

वो मेरे बालों में यूँ उँगलियाँ फिराता था

वसीम बरेलवी

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ

वसीम बरेलवी

नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया

वसीम बरेलवी

मिटे वो दिल जो तिरे ग़म को ले के चल न सके

वसीम बरेलवी

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

वसीम बरेलवी

क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया

वसीम बरेलवी

ख़ुशी का साथ मिला भी तो दिल पे बार रहा

वसीम बरेलवी

वक़्त के साथ साथ चलना तुम

वक़ास बलूच

रात भर तुम न जागते रहियो

वक़ास बलूच

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