साथ Poetry (page 82)
जहाँ मैं खड़ी थी
अम्बरीन सलाहुद्दीन
एक कहानी
अम्बरीन सलाहुद्दीन
कोई एहसास मुकम्मल नहीं रहने देता
अम्बरीन सलाहुद्दीन
ज़माने-भर से जुदा और बा-कमाल कोई
अम्बर खरबंदा
भूला हूँ मैं आलम को सरशार इसे कहते हैं
अमानत लखनवी
बे-क़रारी थी सब उम्मीद-ए-मुलाक़ात के साथ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नशात-ए-उमीद
अल्ताफ़ हुसैन हाली
मुनाजात-ए-बेवा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
हुब्ब-ए-वतन
अल्ताफ़ हुसैन हाली
मैं तो मैं ग़ैर को मरने से अब इंकार नहीं
अल्ताफ़ हुसैन हाली
घर है वहशत-ख़ेज़ और बस्ती उजाड़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
अब वो अगला सा इल्तिफ़ात नहीं
अल्ताफ़ हुसैन हाली
रात सुब्ह-ए-बहार होगी
अल्ताफ़ अहमद कुरेशी
बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा
आलोक मिश्रा
एहसास
अलमास शबी
सवाल कैसे करूँ मैं इस से जवाब है जो मिरी दुआ का
अलमास शबी
जाने किस मोड़ पर मैं ने देखा नहीं
अलमास शबी
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
अल्लामा इक़बाल
तुलू-ए-इस्लाम
अल्लामा इक़बाल
मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे
अल्लामा इक़बाल
जुदा किया तो बहुत ही हँसी-ख़ुशी उस ने
अलीमुल्लाह हाली
रक़ीब-ए-नफ़्स का मुख मोड़ता रह
अलीमुल्लाह
ख़यालात रंगीं नहीं बोलते उस को ज्यूँ बास फूलों के रंगों में रहिए
अलीमुल्लाह
आया है मगर इश्क़ में दिलदार हमारा
अलीमुल्लाह
अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं
अली ज़रयून
अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं
अली ज़रयून
न आसमाँ की कहानी न वाँ का क़िस्सा लिख
अली ज़हीर लखनवी
पहले भी कौन साथ था
अली वजदान
जंगल भी थे दरिया भी
अली वजदान
ग़मों की धूप में जलता हूँ मिस्ल-ए-सहरा मैं
अली वजदान
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