साथ Poetry (page 84)

मैं जब भी घर से निकलता हूँ रात को तन्हा

आलमताब तिश्ना

इस राह-ए-मोहब्बत में तू साथ अगर होता

आलमताब तिश्ना

वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए

आलमताब तिश्ना

सिवाए-दर-ब-दरी उस को ख़ाक मिलता है

आलमताब तिश्ना

मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था

आलमताब तिश्ना

गिनती में बे-शुमार थे कम कर दिए गए

आलमताब तिश्ना

याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द

आलम ख़ुर्शीद

जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है

आलम ख़ुर्शीद

हर घर में कोई तह-ख़ाना होता है

आलम ख़ुर्शीद

हज़ार कारवाँ यूँ तो हैं मेरे साथ मगर

अकरम नक़्क़ाश

तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं

अकरम नक़्क़ाश

क़रार-ए-गुम-शुदा मेरे ख़ुदा कब आएगा

अकरम नक़्क़ाश

मैं नहीं हूँ नहीं कहीं भी नहीं

अकरम नक़्क़ाश

खुली और बंद आँखों से उसे तकता रहा मैं भी

अकरम नक़्क़ाश

निकल रहा हूँ यक़ीं की हद से गुमाँ की जानिब

अकरम महमूद

प्यार इश्क़ हमदर्दी और दोस्ती साज़िश

अकमल इमाम

तर्ग़ीब और उस के ब'अद

अख़्तर-उल-ईमान

काले सफ़ेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम

अख़्तर-उल-ईमान

डासना स्टेशन का मुसाफ़िर

अख़्तर-उल-ईमान

अभी तो पर भी नहीं तौलता उड़ान को मैं

अख़्तर उस्मान

तू ने एक उम्र के बाद पूछा है हाल-ए-दिल

अख्तर शुमार

मेरी रुस्वाई अगर साथ न देती मेरा

अख्तर शुमार

मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ

अख्तर शुमार

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

अख्तर शुमार

या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है

अख्तर शुमार

ख़्वाहिश-ए-जादा-ए-राहत से निकलता कैसे

अख्तर शुमार

अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं

अख्तर शुमार

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें

अख़्तर शीरानी

अँगूठी

अख़्तर शीरानी

सू-ए-कलकत्ता जो हम ब-दिल-ए-दीवाना चले

अख़्तर शीरानी

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