सबसे Poetry (page 18)

उस रोज़ तुम कहाँ थे

तबस्सुम काश्मीरी

एक लम्बी काफ़िर लड़की

तबस्सुम काश्मीरी

क़ुसूर इश्क़ में ज़ाहिर है सब हमारा था

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

तिरे मिज़्गाँ की फ़ौजें बाँध कर सफ़ जब हुईं ख़ड़ियाँ

ताबाँ अब्दुल हई

रोया न हूँ जहाँ में गरेबाँ को अपने फाड़

ताबाँ अब्दुल हई

नहीं तुम मानते मेरा कहा जी

ताबाँ अब्दुल हई

मिरा ख़ुर्शीद-रू सब माह-रूयाँ बीच यक्का है

ताबाँ अब्दुल हई

काबा है अगर शैख़ का मस्जूद-ए-ख़लाइक़

ताबाँ अब्दुल हई

हो रूह के तईं जिस्म से किस तरह मोहब्बत

ताबाँ अब्दुल हई

है आरज़ू ये जी में उस की गली में जावें

ताबाँ अब्दुल हई

ऐश सब ख़ुश आते हैं जब तलक जवानी है

ताबाँ अब्दुल हई

वहशत-ए-दिल ये बढ़ी छोड़ दिए घर सब ने

तअशशुक़ लखनवी

कभी तो शहीदों की क़ब्रों पे आओ

तअशशुक़ लखनवी

कब अपनी ख़ुशी से वो आए हुए हैं

तअशशुक़ लखनवी

दो दमों से है फ़क़त गोर-ए-ग़रीबाँ आबाद

तअशशुक़ लखनवी

मुझ में आ कर ठहर गया कोई

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

हम ने कितने धोके में सब जीवन की बर्बादी की

सय्यद ज़मीर जाफ़री

साहब की बिपता

सय्यद ज़मीर जाफ़री

मेरा इंतिख़ाबी मंशूर

सय्यद ज़मीर जाफ़री

औरतों की असेंबली

सय्यद ज़मीर जाफ़री

यक़ीं के भी क्या क्या हिजाबात हैं

सय्यद ज़मीर जाफ़री

ख़ुलासा ये मिरे हालात का है

सय्यद ज़मीर जाफ़री

कहते हो सब कि तुझ से ख़फ़ा हो गया है यार

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मिल जाएँ अज़दहाम में हम ही ये हम से दूर

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मैं ने कहा कि दा'वा-ए-उलफ़त मगर ग़लत

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कभी ख़ूँ होती हुए और कभी जलते देखा

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जाँ-फ़िशानी का वाँ हिसाब अबस

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

इस तवक़्क़ो' पे कि देखूँ कभी आते जाते

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

बर-सर-ए-लुत्फ़ आज चश्म-ए-दिल-रुबा थी मैं न था

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

रेज़ा रेज़ा जैसे कोई टूट गया है मेरे अंदर

सय्यद शकील दस्नवी

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