सबसे Poetry (page 91)

अहद-नामा-ए-इमराेज़

अज़ीज़ क़ैसी

रात की रात पड़ाव का मेला कोच की धूल सवेरे

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

सुब्ह और शाम के सब रंग हटाए हुए हैं

अज़ीज़ नबील

सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं

अज़ीज़ नबील

ये तेरी आरज़ू में बढ़ी वुसअत-ए-नज़र

अज़ीज़ लखनवी

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

वो निगाहें क्या कहूँ क्यूँ कर रग-ए-जाँ हो गईं

अज़ीज़ लखनवी

जल्वा दिखलाए जो वो अपनी ख़ुद-आराई का

अज़ीज़ लखनवी

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

बेकार ये ग़ुस्सा है क्यूँ उस की तरफ़ देखो

अज़ीज़ लखनवी

दिल ठिकाने हो तो सब कुछ है अज़ीज़

अज़ीज़ हैदराबादी

शहर जिन के नाम से ज़िंदा था वो सब उठ गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

वो साअ'त सूरत-ए-चक़माक़ जिस से लौ निकलती है

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी

क्या हुए बाद-ए-बयाबाँ के पुकारे हुए लोग

अज़ीज़ हामिद मदनी

ख़त्म हुई शब-ए-वफ़ा ख़्वाब के सिलसिले गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी

पकड़ने वाले हैं सब ख़ेमे आग और बेहोश

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ने सब को मुफ़्लिस पा के तोड़ दिया दिल का कश्कोल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

खोल रहे हैं मूँद रहे हैं यादों के दरवाज़े लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम कोई नादान नहीं कि बच्चों की सी बात करें

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम उस को भूल बैठे हैं अँधेरे हम पे तारी हैं

अज़ीज़ अन्सारी

घर से बाहर निकल कर

अज़ीज़ अन्सारी

ज़ौक़-ए-अमल के सामने दूरी सिमट गई

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

यही नहीं कि नज़र को झुकाना पड़ता है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

सुकून-ए-दिल गया नज़रों से सब क़तारे गए

अज़ीम हैदर सय्यद

मआल-ए-दोस्ती कहिए हदीस-ए-मह-वशाँ कहिए

अज़हर सईद

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