सबसे Poetry (page 92)

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए

अज़हर इनायती

वो मेरा यार था मुझ को न ये ख़याल आया

अज़हर इनायती

उजाला दश्त-ए-जुनूँ में बढ़ाना पड़ता है

अज़हर इनायती

तिरे तक़ाज़ों पे चेहरे बदल रहा हूँ मैं

अज़हर इनायती

चलते चलते साल कितने हो गए

अज़हर इनायती

ख़ामोश ज़बाँ से जब तक़रीर निकलती है

अज़हर हाश्मी

सब बातें ला-हासिल ठहरीं सारे ज़िक्र फ़ुज़ूल गए

अज़हर अली

उसी ने सब से पहले हार मानी

अज़हर अदीब

कुछ अब के रस्म-ए-जहाँ के ख़िलाफ़ करना है

अज़हर अदीब

दर-ओ-दीवार से डर लग रहा था

अज़हर अदीब

मुझ को इतना तो यक़ीं है मैं हूँ

अज़हर अब्बास

सुब्ह आती है तो अख़बार से लग जाते हैं

अज़ीज़ परीहारी

मैं सोचता हूँ सबक़ मैं ने वो पढ़ा ही नहीं

अज़ीज़ परीहारी

सुरूर-ए-इश्क़ की मस्ती कहाँ है सब के लिए

अज़ीम कुरेशी

रम-ए-जावेदाना ग़ज़ल ही तो है

अज़ीम कुरेशी

रस्म-ए-अंदेशा से फ़ारिग़ हुए हम

आज़र तमन्ना

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा

आज़ाद गुलाटी

उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

कुछ और हो भी तो राएगाँ है

अय्यूब ख़ावर

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम

अय्यूब ख़ावर

कोई न देखे गूँज हवा की

अय्यूब ख़ावर

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

पूछते हैं तुझ को सफ़्फ़ाकी कहाँ रह कर मिली

औरंगज़ेब

इश्क़ से मैं डर चुका था डर चुका तो तुम मिले

औरंगज़ेब

आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक

औरंगज़ेब

आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है

औरंगज़ेब

कहाँ पहुँच के हदें सब तमाम होती हैं

अतीक़ुल्लाह

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