कारण Poetry (page 6)

इश्क़ ने चुटकी सी ली फिर आ के मेरी जाँ के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

एक तो तिरी दौलत था ही दिल ये सौदाई

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

शहज़ाद क़ैस

शौक़-ए-सफ़र बे-सबब और सफ़र बे-तलब

शहज़ाद अहमद

कुछ तेरे सबब थी मिरे पहलू में हरारत

शहज़ाद अहमद

ज़मीं अपने लहू से आश्ना होने ही वाली है

शहज़ाद अहमद

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

जान मुक़द्दर में थी जान से प्यारा न था

शहज़ाद अहमद

इबलीस भी रख लेते हैं जब नाम फ़रिश्ते

शहज़ाद अहमद

ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है

शहरयार

तू कहाँ है तुझ से इक निस्बत थी मेरी ज़ात को

शहरयार

जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है

शहरयार

हज़ार बार मिटी और पाएमाल हुई है

शहरयार

गुज़रे थे हुसैन इब्न-ए-अली रात इधर से

शहरयार

कार-ए-बेहूदा

शहराम सर्मदी

हम अपने इश्क़ की बाबत कुछ एहतिमाल में हैं

शहराम सर्मदी

हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई

शहराम सर्मदी

कभी क़लम कभी नेज़ों पे सर उछलते हैं

शाहजहाँ बानो याद

इक हुजूम-ए-गिर्या की हर नज़र तमाशाई

शाहिदा तबस्सुम

बू-ए-पैराहन-ए-सदा आए

शाहिद माहुली

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

कैसे तोड़ी गई ये हद्द-ए-अदब पूछते हैं

शाहिद जमाल

कोई बच नहीं पाता ऐसा जाल बुनते हैं

शाहिद फ़रीद

दयार-ए-शाम न बुर्ज-ए-सहर में रौशन हूँ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

बे-सबब हाथ कटारी को लगाना क्या था

शाह नसीर

हमारे हाल पे किस दिन जफ़ा नहीं करते

शफ़क़त काज़मी

दोस्त या दुश्मन-ए-जाँ कुछ भी तुम अब बन जाओ

शफ़ीक़ ख़लिश

मुझे किसी पे मोहब्बत का कुछ गुमाँ सा है

शफ़क़ सुपुरी

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