वृक्षारोपण Poetry (page 15)

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए

भारत भूषण पन्त

ख़ुद पर जो ए'तिमाद था झूटा निकल गया

भारत भूषण पन्त

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर

भारत भूषण पन्त

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बशीर बद्र

मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा

बशीर बद्र

होगा क्या चाँद-नगर सोचते हैं

बशीर मुंज़िर

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

उदास बाम है दर काटने को आता है

बाक़ी अहमदपुरी

जाने क्या सोच के घर तक पहुँचा

बक़ा बलूच

हवा के दोश पर लगता है उड़ने

बलवान सिंह आज़र

जब कोई टीस दिल दुखाती है

बलवान सिंह आज़र

हमें देखा न कर उड़ती नज़र से

बकुल देव

रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है

बख़्श लाइलपूरी

रुख़-ए-हयात है शर्मिंदा-ए-जमाल बहुत

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

मसअले ज़ेर-ए-नज़र कितने थे

अज़रा वहीद

ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है

अज़रा वहीद

फ़ज़ा का रंग निखरता दिखाई देता है

अज़रा वहीद

ख़ाक उड़ाते हुए ये म'अरका सर करना है

अज़्म शाकरी

दरीदा-पैरहनों में शुमार हम भी हैं

अज़्म शाकरी

उठा के मेरे ज़ेहन से शबाब कोई ले गया

अज़ीज़ तमन्नाई

उस की सोचें और उस की गुफ़्तुगू मेरी तरह

अज़ीज़ नबील

अभी तो कुछ लोग ज़िंदगी में हज़ार सायों का इक शजर हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना

अज़ीज़ हामिद मदनी

सर पर मिरे उम्र-भर रही धूप

अज़हर सईद

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं

अज़हर नक़वी

चाहा है जिस का साया शजर वो बबूल है

अज़हर नैयर

सच बोलना चाहें भी तो बोला नहीं जाता

अज़हर नैयर

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