व्यक्ति Poetry (page 31)

यही होना था और हुआ जानाँ

आरिफ़ इशतियाक़

लिबास गर्द का और जिस्म नूर का निकला

अक़ील शादाब

बाइ'स-ए-अर्ज़-ए-हुनर कर्ब-ए-निहानी निकला

अक़ील शादाब

असर मिरी ज़बान में नहीं रहा

अक़ील शादाब

कितने सवाल सब की निगाहों में रख दिए

अक़ील दानिश

एहसास-ए-ज़ियाँ हम में से अक्सर में नहीं था

अक़ील अब्बास जाफ़री

हुजूम शोला में था हल्क़ा-ए-शरर में था

अनवर सिद्दीक़ी

इश्क़ तो हर शख़्स करता है 'शुऊर'

अनवर शऊर

मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था

अनवर शऊर

कट चुकी थी ये नज़र सब से बहुत दिन पहले

अनवर शऊर

हो गए दिन जिन्हें भुलाए हुए

अनवर शऊर

तलाश जिस को मैं करता फिरा ख़राबों में

अनवर सदीद

महफ़ूज़ रहेगा क्या एहसास का आईना

अनवर मीनाई

मुझे ख़ुद से भी खटका सा लगा था

अनवर मसूद

मैं देख भी न सका मेरे गिर्द क्या गया था

अनवर मसूद

इशारतों की वो शर्हें वो तज्ज़िया भी गया

अनवर मसूद

दुनिया भी अजब क़ाफ़िला-ए-तिश्ना-लबाँ है

अनवर मसूद

अब नाम नहीं काम का क़ाएल है ज़माना

अनवर जलालपुरी

शादाब-ओ-शगुफ़्ता कोई गुलशन न मिलेगा

अनवर जलालपुरी

बातें पागल हो जाती हैं

अनवार फ़ितरत

तुम अकेले में मिले ही नहीं वर्ना तुम को

अंजुम सलीमी

ख़ाक छानी न किसी दश्त में वहशत की है

अंजुम सलीमी

दुखी दिलों के लिए ताज़ियाना रखता है

अंजुम रूमानी

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

अंजुम रहबर

यही तुम पर भी खुलना है

अंजुम ख़लीक़

ये कैसी बात मिरा मेहरबान भूल गया

अंजुम ख़लीक़

पलकों तक आ के अश्क का सैलाब रह गया

अंजुम ख़लीक़

ख़ाक का रिज़्क़ यहाँ हर कस-ओ-ना-कस निकला

अंजुम ख़लीक़

जब तक फ़सील-ए-जिस्म का दर खुल न जाएगा

अंजुम ख़लीक़

उस बुत को ज़रा छू के तो देखें कि वो क्या है

अनजुम अब्बासी

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