शाम Poetry (page 20)

कोई टूटी हुई कश्ती का तख़्ता भी अगर है ला

शफ़ीक़ जौनपुरी

कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है

शफ़ीक़ जौनपुरी

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

शफ़ीक़ जौनपुरी

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

आदतन मायूस अब तो शाम है

शादाब उल्फ़त

ख़लिश-ए-ख़ार हो वहशत में कि ग़म टूट पड़े

शाद लखनवी

दम-ए-आख़िर ये शिकवा क्या न करता

शाद लखनवी

कौन सी बात नई ऐ दिल-ए-नाकाम हुई

शाद अज़ीमाबादी

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम

शाद अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

न पूछ देख के कितना मलाल होता है

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

दूर हुआ इबहाम कहानी ख़त्म हुई

शबनम शकील

दर आया अंधेरा आँखों में और सब मंज़र धुँदलाए हैं

शबनम शकील

अब मुझ को क्या ख़बर वो यहाँ है भी या नहीं

शबनम शकील

नज़्म

शबनम अशाई

किन सोचों में डूबे हो

शबनम अशाई

दोस्ती का सितारा

शब्बीर शाहिद

ये अपने आप पे ताज़ीर कर रही हूँ मैं

शबाना यूसुफ़

लौट आएगा किसी शाम यही लगता है

शबाना यूसुफ़

है कोई दर्द मुसलसल रवाँ-दवाँ मुझ में

शबाना यूसुफ़

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

नज़र चुरा गए इज़हार-ए-मुद्दआ से मिरे

शानुल हक़ हक़्क़ी

बिखर जाएगी शाम आहिस्ता बोलो

शानुल हक़ हक़्क़ी

औरत

शाद आरफ़ी

क़दम सँभल के बढ़ाओ कि रौशनी कम है

शाद आरफ़ी

खरी बातें ब-अंदाज़-ए-सुख़न कह दूँ तो क्या होगा

शाद आरफ़ी

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