शाम Poetry (page 18)

वो मोड़

शहरयार

एक और मौत

शहरयार

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

शिकस्त

शहराम सर्मदी

ख़ुदा से

शहराम सर्मदी

कल शाम

शहराम सर्मदी

जब तुम मुझ से मिलने आओ

शहराम सर्मदी

ख़ला सा ठहरा हुआ है ये चार-सू कैसा

शहराम सर्मदी

ब-राह-ए-रास्त नहीं फिर भी राब्ता सा है

शहराम सर्मदी

आदाब ज़िंदगी से बहुत दूर हो गया

शहूद आलम आफ़ाक़ी

हर किसी ख़्वाब के चेहरे पे लिखूँ नाम तिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

दिल भी दाग़-ए-नक़्श-ए-कुहन से बुझा हुआ था

शहनवाज़ ज़ैदी

उसे जब भी देखा बहुत ध्यान से

शाहिदा तबस्सुम

मैं ज़हर रही हर शाम रही

शाहिदा तबस्सुम

जंगलों में बारिशें हैं दूर तक

शाहिदा तबस्सुम

इक हुजूम-ए-गिर्या की हर नज़र तमाशाई

शाहिदा तबस्सुम

सवाद-ए-शाम से ता-सुब्ह-ए-बे-किनार गई

शाहिदा हसन

कोई तारा न दिखा शाम की वीरानी में

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह

शाहिदा हसन

चराग़-ए-शाम ही तन्हा नहीं है

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

बात कोई एक पल उस के ध्यान के आने की थी

शाहिदा हसन

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है

शाहिद ज़की

अजीब लोग

शाहिद माहुली

हर मरहले से यूँ तो गुज़र जाएगी ये शाम

शाहिद माहुली

भटक रही है अंधेरों में आँख देखे क्या

शाहिद माहुली

सह-पहर ही से कोई शक्ल बनाती है ये शाम

शाहिद लतीफ़

मैं इंतिहा-ए-यास में तन्हा खड़ा रहा

शाहिद कलीम

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