शाम Poetry (page 16)

कौन है दर्द-आश्ना संग-दिली का दौर है

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

ग़म दो आलम का जो मिलता है तो ग़म होता है

शमीम करहानी

चमन चमन जो ये सुब्ह-ए-बहार की ज़ौ है

शमीम करहानी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

ऐसे कई सवाल हैं जिन का जवाब कुछ नहीं

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

ज़िंदगी हँसती है सुब्ह-ओ-शाम तेरे शहर में

शमीम फ़तेहपुरी

अँधेरी शब है कहाँ रूठ कर वो जाएगा

शमीम फ़ारूक़ी

शहर-ए-जाँ में इज़तिराब-ए-सोज़-ए-फ़न देखेगा कौन

शमीम आज़र

याद आती है अच्छी सी कोई बात सर-ए-शाम

शमीम अब्बास

हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाए हुए हैं

शाकिर ख़लीक़

रोज़ शाम होती है रोज़ हम सँवरते हैं

शकीला बानो

दिल की कहानियों को नया मोड़ क्यूँ दिया

शकील शम्सी

ज़ात का गहरा अंधेरा है बिखर जा मुझ में

शकील मज़हरी

शाम मिरी कमज़ोरी है

शकील जाज़िब

हासिल-ए-उम्र है जो एक कसक बाक़ी है

शकील जाज़िब

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है

शकील बदायुनी

नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है

शकील बदायुनी

कहाँ है आ जा

शकील बदायुनी

तुम ने ये क्या सितम किया ज़ब्त से काम ले लिया

शकील बदायुनी

सुब्ह का अफ़्साना कह कर शाम से

शकील बदायुनी

नुमायाँ दोनों जानिब शान-ए-फ़ितरत होती जाती है

शकील बदायुनी

न पैमाने खनकते हैं न दौर-ए-जाम चलता है

शकील बदायुनी

मौसम-ए-गुल साथ ले कर बर्क़ ओ दाम आ ही गया

शकील बदायुनी

इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे

शकील बदायुनी

इहानत-ए-दिल-ए-सब्र-आज़मा नहीं करते

शकील बदायुनी

हज़ार क़ैद-ए-ख़िज़ाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे

शकील बदायुनी

हज़ार क़ैद-ए-जवाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे

शकील बदायुनी

ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे

शकील बदायुनी

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