शाम Poetry (page 17)

दिल में किसी ख़लिश का गुज़र चाहता हूँ मैं

शकील बदायुनी

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया

शकील बदायुनी

आख़िरी वक़्त है आख़िरी साँस है ज़िंदगी की है शाम आख़िरी आख़िरी

शकील बदायुनी

आदमी न इतना भी दूर हो ज़माने से

शकील बदायुनी

घर के दीवार-ओ-दर पे शाम ही से

शकील आज़मी

मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल

शकील आज़मी

मुजरिम

शकेब जलाली

शफ़क़ जो रू-ए-सहर पर गुलाल मलने लगी

शकेब जलाली

रौशन हैं दिल के दाग़ न आँखों के शब-चराग़

शकेब जलाली

क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त

शकेब जलाली

ख़्वाब-ए-गुल-रंग के अंजाम पे रोना आया

शकेब जलाली

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए

शकेब जलाली

आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी

शकेब जलाली

बे-आब-ओ-बे-ग्याह हुआ उस को छोड़ कर

शकेब अयाज़

आज लगता है समुंदर में है तुग़्यानी सी

शाइस्ता मुफ़्ती

दाएरे

शाइस्ता हबीब

शम्अ हर शाम तेरे रोने पर

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

किया था दिन का वादा रात को आया तो क्या शिकवा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तू देख उसे सब जा आँखों के उठा पर्दे

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखता हूँ मैं हक़ पर नज़र कोई कुछ कहो कोई कुछ कहो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जुम्बिश-ए-दिल नहीं बेजा तू किधर भूला है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब वो आली-दिमाग़ हँसता है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

औक़ात-ए-शैख़ गो कि सुजूद ओ क़याम है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

डूब जाता है दमकता हुआ सूरज लेकिन

शहज़ाद अहमद

अपने ही अक्स को पानी में कहाँ तक देखूँ

शहज़ाद अहमद

जीने मरने के दरमियान एक साअत

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

इबलीस भी रख लेते हैं जब नाम फ़रिश्ते

शहज़ाद अहमद

देखने उस को कोई मेरे सिवा क्यूँ आए

शहज़ाद अहमद

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