शाम Poetry (page 23)

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

अलकुबड़े

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं किसी जवाज़ के हिसार में न था

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़्वाब को दिन की शिकस्तों का मुदावा न समझ

साक़ी फ़ारुक़ी

में अब तक दिन के हंगामों में गुम था

साक़ी अमरोहवी

सफ़र की शाम सितारा नसीब का जागा

समीना राजा

कब इस से क़ब्ल नज़र में गुल-ए-मलाल खिला

समीना राजा

रौशनी तक रौशनी का रास्ता कह लीजिए

समद अंसारी

दस्त-ए-शबनम पे दम-ए-शो'ला-नवाई न रखो

समद अंसारी

आहटों से दिमाग़ जलता है

समद अंसारी

जब शाम शहर में आती है

सलमान सईद

थी ये उम्मीद कि वो लौट के घर आएगा

सलमा शाहीन

मसअला हुस्न-ए-तख़य्युल का है न इल्हाम का है

सलमा शाहीन

तमाम उम्र की तन्हाइयों पे भारी थी

सलीम शुजाअ अंसारी

कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का

सालिम सलीम

बढ़ते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम अज़्म-ए-सफ़र को क्या करूँ

सालिक लखनवी

कौन कहता है कि यूँही राज़दार उस ने किया

सलीम सिद्दीक़ी

मिरी थकन मिरे क़स्द-ए-सफ़र से ज़ाहिर है

सलीम शाहिद

क्या मेरा इख़्तियार ज़मान-ओ-मकान पर

सलीम शाहिद

तू दरिया है और ठहरने वाला मैं

सलीम मुहीउद्दीन

डूबने वाले भी तन्हा थे तन्हा देखने वाले थे

सलीम कौसर

अभी जो गर्दिश-ए-अय्याम से मिला हूँ मैं

सलीम कौसर

ख़ुशबू सा कोई दिन तो सितारा सी कोई शाम

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

एक तो दुनिया का कारोबार है

सलीम फ़राज़

नाईट-कलब

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

नींद से पहले

सलीम अहमद

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

सलीम अहमद

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