शाम Poetry (page 25)

मुझ को तो ईद में भी फ़राग़त कहाँ मिली

साजिद सजनी

रहता है आस-पास सवेरे से शाम तक

साजिद सजनी

हर आइने में तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल आते हैं

साजिद अमजद

चलो दुनिया से मिलना छोड़ देंगे

साजिद अमजद

नहीं है याद कि वो याद कब नहीं आया

साइम जी

अपने अंजाम से बे-ख़बर ज़िंदगी

सैलानी सेवते

वफ़ा अंजाम होती जा रही है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

उम्र गुज़री मिरी शीरीनी-ए-गुफ़्तार के साथ

सैफ़ुद्दीन सैफ़

सुब्ह से शाम के आसार नज़र आने लगे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

क्या मंज़िल-ए-ग़म सिमट गई है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

हसीन रातों जमील तारों की याद सी रह गई है बाक़ी

सैफ़ुद्दीन सैफ़

वो आरिज़ गुलाबी वो गेसू घनेरे

सैफ़ी प्रेमी

वो पर्दा ज़ीनत-ए-दर के सिवा कुछ और नहीं

सैफ़ बिजनोरी

सुब्ह-ए-इशरत ज़िंदगी की शाम हो कर रह गई

सैफ़ बिजनोरी

जागीर

साहिर लुधियानवी

एहसास-ए-कामराँ

साहिर लुधियानवी

दीवारों का जंगल जिस का आबादी है नाम

साहिर लुधियानवी

पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है

साहिर लुधियानवी

अक़ाएद वहम हैं मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी

साहिर लुधियानवी

जला है किस क़दर दिल ज़ौक़-ए-काविश-हा-ए-मिज़्गाँ पर

साहिर देहल्वी

शफ़्फ़ाफ़ रंग

साहिल अहमद

हवा ने सीने में ख़ंजर छुपा के रक्खा है

साहिबा शहरयार

ख़्वाब देखूँ कोई महताब लब-ए-बाम उतरे

सहबा वहीद

साँप सपेरा और मैं

सहबा अख़्तर

पागल औरत

सहबा अख़्तर

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का

सहबा अख़्तर

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सहबा अख़्तर

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

मन के मंदिर में है उदासी क्यूँ

सहर अंसारी

अब यही रंज-ए-बे-दिली मुझ को मिटाए या बनाए

सहर अंसारी

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