शाम Poetry (page 26)
क्यूँ तू ने वा किया था बंद-ए-क़बा चमन में
सग़ीर अली मुरव्वत
ख़ता-वार-ए-मुरव्वत हो न मरहून-ए-करम हो जा
साग़र सिद्दीक़ी
है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
साग़र सिद्दीक़ी
एक नग़्मा इक तारा एक ग़ुंचा एक जाम
साग़र सिद्दीक़ी
सावन की रुत आ पहुँची काले बादल छाएँगे
साग़र निज़ामी
लड़की की दुआ
साग़र ख़य्यामी
क्रिकेट मैच
साग़र ख़य्यामी
दीवानगी-ए-इश्क़ पे इल्ज़ाम कुछ भी हो
साग़र ख़य्यामी
तराना-ए-क़ौमी
सफ़ीर काकोरवी
सूने ही रहे हिज्र के सहरा उसे कहना
सफ़दर सलीम सियाल
रस्तों पे न बैठो कि हवा तंग करेगी
सफ़दर सलीम सियाल
इस से पहले कि किसी घाट उतारे जाते
सफ़दर सलीम सियाल
नज़्म
सईदुद्दीन
अजब मौजूदगी है जो कमी पर मुश्तमिल है
सईद शरीक़
ख़ुदी मेरा पता देती है अब भी
सईद आरिफ़ी
ग़म रात-दिन रहे तो ख़ुशी भी कभी रही
सईद अख़्तर
खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया
सईद अहमद
जब समाअत तिरी आवाज़ तलक जाती है
सईद अहमद
इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए
सईद अहमद
दुरून-ए-चश्म हर इक ख़्वाब मर रहा है बस
सादिया सफ़दर सादी
किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें
सादिक़ नसीम
इस एहतिमाम से परवाने पेशतर न जले
सादिक़ नसीम
लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना
सदफ़ जाफ़री
न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है
सदा अम्बालवी
कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना
सचिन शालिनी
जब भी पढ़ा है शाम का चेहरा वरक़ वरक़
साबिर ज़ाहिद
शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा
साबिर ज़फ़र
सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ
साबिर ज़फ़र
कहती है ये शाम की नर्म हवा फिर महकेगी इस घर की फ़ज़ा
साबिर ज़फ़र
ये सोच के राख हो गया हूँ
साबिर ज़फ़र
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