शाम Poetry (page 24)

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

तर्क उन से रस्म-ओ-राह-ए-मुलाक़ात हो गई

सलीम अहमद

मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का

सलीम अहमद

जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में

सलीम अहमद

हुई सुब्ह जाम खनक उठे हुई शाम नग़्मे बिखर गए

सलाम संदेलवी

तरब-आफ़रीं है कितना सर-ए-शाम ये नज़ारा

सलाम संदेलवी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

जंगली नाच

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

अवाम

सलाम मछली शहरी

अस्पताल

सलाम मछली शहरी

मिरी रात खो गई है किसी जागते बदन में

सलाहुद्दीन परवेज़

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

बहार आ कर जो गुलशन में वो गाएँ

सख़ी लख़नवी

शहर के आबाद सन्नाटों की वहशत देख कर

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शाम

सज्जाद बाक़र रिज़वी

क्या इश्क़ का लें नाम हवस आम नहीं है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया

सज्जाद बाक़र रिज़वी

है दुकान-ए-शौक़ भरी हुई कोई मेहरबाँ हो तो ले के आ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दुनिया दुनिया सैर सफ़र थी शौक़ की राह तमाम हुई

सज्जाद बाक़र रिज़वी

चाहत जी का रोग है प्यारे जी को रोक लगाओ क्यूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अपने जीने को क्या पूछो सुब्ह भी गोया रात रही

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुम ग़लत समझे हमें और परेशानी है

सज्जाद बलूच

तुम ग़लत समझे हमें और परेशानी है

सज्जाद बलूच

देख पाई न मिरे साए में चलता साया

सज्जाद बलूच

इक दर्द सब के दर्द का मज़हर लगा मुझे

सज्जाद बाबर

धीमी बारिश की लय में अहवाल सुनाते रहना

सज्जाद बाबर

भटकी है उजालों में नज़र शाम से पहले

सज्जाद बाबर

मी-यौमिल-हिसाब

साजिदा ज़ैदी

जज़्बा-ए-इश्क़ भी है गर्मी-ए-बाज़ार भी है

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

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