शाम Poetry (page 27)

शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

किसी तौर हो न पिन्हाँ तिरा रंग-ए-रू-सियाही

साबिर ज़फ़र

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

साबिर वसीम

वो फूल था जादू-नगरी में जिस फूल की ख़ुश्बू भाई थी

साबिर वसीम

उस जंगल से जब गुज़रोगे तो एक शिवाला आएगा

साबिर वसीम

पलकों पर नम क्या फैल गया

साबिर वसीम

लोगो ये अजीब सानेहा है

साबिर वसीम

करता है कोई और भी गिर्या मिरे दिल में

साबिर वसीम

इक शक्ल बे-इरादा सर-ए-बाम आ गई

साबिर वसीम

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

ज़ुल्फ़ की शाम सुब्ह चेहरे की

साबिर दत्त

अजनबी

साबिर दत्त

मौसमों का जवाब दे दीजे

साबिर दत्त

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है

साबिर

तू नहीं है तो मिरी शाम अकेली चुप है

सबीहा सबा, पाकिस्तान

हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली

सबा जायसी

बू-ए-ख़ुश की तरह हर सम्त बिखर जाऊँगा

सबा जायसी

आशियाँ ढूँढती है

सबा इकराम

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सबा अख़्तर

आईना कैसा था वो शाम-ए-शकेबाई का

सबा अकबराबादी

उस का वादा ता-क़यामत कम से कम

सबा अकबराबादी

चला-चल मोहलत-ए-आराम क्या है

सबा अकबराबादी

सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई

सबा अफ़ग़ानी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

मौत इक दरिंदा है ज़िंदगी बला सी है

सादुल्लाह शाह

कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ

एस ए मेहदी

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

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