शाम Poetry (page 28)

चमगादड़

रियाज़ लतीफ़

वस्ल की रात के सिवा कोई शाम

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

ये बला मेरे सर चढ़ी ही नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी

न तारे अफ़्शाँ न कहकशाँ है नमूना हँसती हुई जबीं का

रियाज़ ख़ैराबादी

जिस दिन से हराम हो गई है

रियाज़ ख़ैराबादी

इश्क़ में दिल-लगी सी रहती है

रियाज़ ख़ैराबादी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

आरज़ू भी तो कर नहीं आती

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ बला-नोश को तलछट भी है काफ़ी साक़ी

रिन्द लखनवी

चाँद वीरान है सदियों से मिरे दिल की तरह

रिफ़अत सरोश

छुपे हुए थे जो नक़्द-ए-शुऊ'र के डर से

रियाज़ मजीद

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

सेल्फ़ी

रहमान फ़ारिस

यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर

रहमान फ़ारिस

विदा-ए-यार का लम्हा ठहर गया मुझ में

रहमान फ़ारिस

सुकूत-ए-शाम में गूँजी सदा उदासी की

रहमान फ़ारिस

नज़्ज़ारा-ए-जमाल ने सोने नहीं दिया

रेहाना रूही

तुम अँधियारों की बात करो

रेहान अल्वी

ये दौर-ए-कम-नज़राँ है तो फिर सिला कैसा

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे कटे क़सीदा-गो हर्फ़-गरों के दरमियाँ

राज़ी अख्तर शौक़

इन्ही गलियों में इक ऐसी गली है

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई

रज़ा लखनवी

ये बात तिरी चश्म-ए-फुसूँ-कार ही समझे

रज़ा जौनपुरी

कुछ तो हासिल हो गया इरफ़ान-ए-मय-ख़ाना मुझे

रज़ा जौनपुरी

मा'मूरा-ए-अफ़्क़ार में इक हश्र बपा है

रज़ा हमदानी

चुप हो क्यूँ ऐ पयम्बरान-ए-क़लम

रज़ा हमदानी

शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का

रज़ा अज़ीमाबादी

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