शाम Poetry (page 30)

शाम से पहले घर गए होते

रसा चुग़ताई

जब तक दौर-ए-जाम चलेगा

रसा चुग़ताई

चराग़-ए-सुब्ह से शाम-ए-वतन की बात करो

रसा चुग़ताई

परिंदे होते अगर हम हमारे पर होते

रऊफ़ अमीर

सौदा-ए-सज्दा शाम-ओ-सहर मेरे सर में है

रंजूर अज़ीमाबादी

ऐसी प्यारी शाम में जी बहलाने को

राना आमिर लियाक़त

इक तस्वीर पिया की उभरी मंज़र से

राना आमिर लियाक़त

थकन का बोझ बदन से उतारते हैं हम

रम्ज़ी असीम

वो जो भी बख़्शें वो इनआम ले लिया जाए

रम्ज़ आफ़ाक़ी

तिरे इंतिज़ार में इस तरह मिरा अहद-ए-शौक़ गुज़र गया

राम रियाज़

ज़िंदाँ में भी वही लब-ओ-रुख़्सार देखते

राम रियाज़

मुझे कैफ़-ए-हिज्र अज़ीज़ है तू ज़र-ए-विसाल समेट ले

राम रियाज़

फिर कोई ख़लिश नज़्द-ए-राग-ए-जाँ तो नहीं है

राम कृष्ण मुज़्तर

मजबूर तो बहुत हैं मोहब्बत में जी से हम

राम कृष्ण मुज़्तर

बहारें और वो रंगीं नज़ारे याद आते हैं

राम कृष्ण मुज़्तर

देख लिया क्या जाने शाम की सूनी आँखों में

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

उदास शाम की यादों भरी सुलगती हवा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ढलेगी शाम जहाँ कुछ नज़र न आएगा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ये ज़रा सा कुछ और एक-दम बे-हिसाब सा कुछ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो जिसे अब तक समझता था मैं पत्थर, सामने था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

शफ़क़ शजर मौसमों के ज़ेवर नए नए से

राजेन्द्र मनचंदा बानी

पैहम मौज-ए-इमकानी में

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मुझे पता था कि ये हादसा भी होना था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कहाँ तलाश करूँ अब उफ़ुक़ कहानी का

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इधर की आएगी इक रौ उधर की आएगी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हरी सुनहरी ख़ाक उड़ाने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हमें लपकती हवा पर सवार ले आई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दमक रहा था बहुत यूँ तो पैरहन उस का

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है

राजेश रेड्डी

तुम्हारी याद

राजेन्द्र नाथ रहबर

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