शाम Poetry (page 50)

बे-तहाशा सी ला-उबाली हँसी

बशीर बद्र

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ

बशीर बद्र

सोए हुए जज़्बों को जगा कर फिर वो शाम न आई

बशीर मुंज़िर

इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से

बशीर अहमद बशीर

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

बशर नवाज़

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

बहुत जल्दी थी घर जाने की लेकिन

बाक़ी अहमदपुरी

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जहन्नम

बाक़र मेहदी

वो रिंद क्या कि जो पीते हैं बे-ख़ुदी के लिए

बाक़र मेहदी

सादा काग़ज़ पे कोई नाम कभी लिख लेना!

बाक़र मेहदी

किसी पे कोई भरोसा करे तो कैसे करे

बाक़र मेहदी

इश्क़ की सारी बातें ऐ दिल पागल-पन की बातें हैं

बाक़र मेहदी

और कोई जो सुने ख़ून के आँसू रोए

बाक़र मेहदी

कम कम रहना ग़म के सुर्ख़ जज़ीरों में

बक़ा बलूच

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

दूर हो दर्द-ए-दिल ये और दर्द-ए-जिगर किसी तरह

बहराम जी

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो

बद्र-ए-आलम ख़लिश

धानी सुरमई सब्ज़ गुलाबी जैसे माँ का आँचल शाम

बद्र वास्ती

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जिसे भी देखिए प्यासा दिखाई देता है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

तुम को मैं जब सलाम करता हूँ

बाबर रहमान शाह

जलती बुझती हुई आँखों में सितारे लिक्खे

अज़रा वहीद

सेल्फ-पोर्ट्रेट

अज़रा अब्बास

ए'तिराफ़

अज़रा अब्बास

आख़िरी रूसूमात के दौरान

अज़रा अब्बास

नन्हा ग़ासिब

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

उस आँख से वहशत की तासीर उठा लाया

अज़्म बहज़ाद

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