शाम Poetry (page 49)

सर-ए-शोरीदा पा-ए-दश्त-ए-पैमा शाम-ए-हिज्राँ था

बयान मेरठी

ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स

बयान मेरठी

कहता है कौन हिज्र मुझे सुब्ह ओ शाम हो

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

इक हुस्न-ए-बे-मिसाल के जो रू-ब-रू हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

तख़लीक़-ए-काएनात दिगर कर सके तो कर

बशीर फ़ारूक़

ये परिंदे भी खेतों के मज़दूर हैं

बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

बशीर बद्र

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम

बशीर बद्र

न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर

बशीर बद्र

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए

बशीर बद्र

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

बशीर बद्र

इक शाम के साए तले बैठे रहे वो देर तक

बशीर बद्र

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम

बशीर बद्र

यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो

बशीर बद्र

उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है

बशीर बद्र

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

बशीर बद्र

नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह

बशीर बद्र

मुझ से बिछड़ के ख़ुश रहते हो

बशीर बद्र

मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी

बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

बशीर बद्र

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

बशीर बद्र

घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

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