शाम Poetry (page 48)

गुम-शुदा आदमी का इंतिज़ार

चन्द्रभान ख़याल

नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं

चकबस्त ब्रिज नारायण

फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना

चकबस्त ब्रिज नारायण

सवाद-ए-शाम से डरता हुआ नज़र आया

बुशरा ज़ैदी

अभी बादलों का सफ़र कहाँ मिरे मेहरबाँ

बुशरा हाश्मी

उन्हें ढूँडो

बुशरा एजाज़

अगर दुश्मन की थोड़ी सी मरम्मत और हो जाती

बूम मेरठी

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

बिस्मिल साबरी

तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब मुलाक़ात कहाँ शीशे से पैमाने से

बिस्मिल अज़ीमाबादी

आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं

बिस्मिल इलाहाबादी

दुनिया में वफ़ा-केश बशर ढूँढ रहा हूँ

बिर्ज लाल रअना

आप अपने रक़ीब हैं हम लोग

बिर्ज लाल रअना

नाम उस का

बिमल कृष्ण अश्क

यही इक मश्ग़ला शाम-ओ-सहर है

बिल्क़ीस बेगम

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे

भारत भूषण पन्त

दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे

भारत भूषण पन्त

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

बेख़ुद देहलवी

हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है

बेख़ुद देहलवी

उन को दिमाग़-ए-पुर्सिश-ए-अहल-ए-मेहन कहाँ

बेखुद बदायुनी

बदन की आँच से सँवला गए हैं पैराहन

बेकल उत्साही

मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा

बेकल उत्साही

मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ

बेकल उत्साही

तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है

बहज़ाद लखनवी

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है

बहज़ाद लखनवी

ये दिल जो मुज़्तरिब रहता बहुत है

बेदिल हैदरी

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है

बेदम शाह वारसी

न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है

बेदम शाह वारसी

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